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समलैंगिक संबंधों पर सरकार को फटकार

समलैंगिक संबंधों पर सरकार को फटकार

नई दिल्ली. 28 फरवरी 2012

समलैंगिक


समलैंगिकता के मुद्दे पर केंद्र सरकार द्वारा बार-बार अपना रुख बदलने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़े शब्दों में कहा कि सरकार व्यवस्था का मजाक उड़ा रही है और अदालत का समय बर्बाद कर रही है.

मंगलवार को इस मुद्दे पर बहस के दौरान केंद्र सरकार ने इस बात का समर्थन किया कि समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे से हटाया जाना आपत्तिजनक नहीं है. सरकार की ओर से पेश हुये अडिशनल सॉलिसिटर जनरल मोहन जैन ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय में कोई कानूनी खामी मालूम नहीं पड़ती. कोर्ट का निर्णय कानूनी रूप से सही है या नहीं, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट निर्णय ले सकता है.

गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने का फैसला सुनाया था. अपने फ़ैसले में अदालत ने कहा था कि दो मर्द या औरत अगर अपनी सहमति से बंद कमरे के भीतर समलैंगिक यौन संबंध बनाते हैं तो ये अपराध नहीं है. इसके बाद समलैंगिकता को अपराध बताने वाली आईपीसी की धारा 377 को बदलने के निर्देश दिये गये थे.

इसके बाद दिल्ली कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स की पहल पर यह मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा था. पिछले सप्ताह अतिरिक्त अटोर्नी जनरल पीपी मल्होत्रा ने समलैंगिकता के मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखते हुये कहा था कि सरकार की नजर में समलैंगिकता अनैतिक है. मल्होत्रा ने समलैंगिकता को यौन अपराध की श्रेणी से हटाये जाने का विरोध करते हुये कहा था कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था में इस तरह के संबंधों को स्वीकार नहीं किया जा सकता. हालांकि बाद में गृह मंत्रालय ने इस बात से इंकार करते हुये कहा है कि समलैंगिकता को लेकर सरकार का कोई रुख नहीं है.

अब मंगलवार को फिर एक बार सरकार ने कहा कि समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से हटाये जाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है. अदालत की कार्रवाई शुरु होते ही एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मोहन जैन ने बेंच से कहा कि सरकारी फैसले के मुताबिक 2009 में समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर करने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कोर्ट में पेश हुए जैन का रुख केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इस मामले में हाजिर हुए अडिशनल सॉलीसिटर जनरल पी. पी. मल्होत्रा की दलील से उलट है, जिन्होंने इसका विरोध किया था.

समलैंगिकता के मुद्दे पर सरकार की ढुलमुल नीति को लेकर जस्टिस जी. एस. सिंघवी और जस्टिस एस. जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने केंद्र सरकार को जम कर फटकार लगाई. अदालत ने कहा कि सरकार व्यवस्था का मजाक नहीं बनाए और और अदालत का समय बर्बाद नहीं करे.


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