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अधिक खनन, अधिक माओवाद-जयराम रमेश

अधिक खनन, अधिक माओवाद-जयराम रमेश

रांची. 1 मार्च 2012

जयराम रमेश


केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने झारखंड के माओवाद प्रभावित इलाकों में निजी कंपनियों को माइनिंग दिये जाने का विरोध करते हुये कहा है कि जितनी अधिक माइनिंग होगी, माओवाद उतना ही बढ़ेगा. पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंदा क्षेत्र में विकास योजनाओं की समीक्षा करते हुये उन्होंने यह बात कही.

जयराम रमेश ने कहा कि जंगल के इलाकों में अधिक खनन का अर्थ है और अधिक माओवाद. इस बात को लेकर मेरे विचार बिल्कुल साफ़ हैं कि क्षेत्र में सेल यानी स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अलावा और किसी को खनन के अधिकार नहीं मिलने चाहिए. यहां तक कि सेल के खनन पर भी नियंत्रण होना चाहिए.

केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने पर्यावरण विभाग के अपने कार्यकाल का उल्लेख करते हुये कहा कि बतौर पर्यावरण मंत्री मैंने केवल सार्वजनिक उपक्रम सेल को लौह अयस्क के खनन की अनुमति दी थी. मैंने आदेश में यह बात साफ़ तौर पर लिखा था कि किसी निजी फ़र्म को खनन की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए.

जयराम रमेश ने कहा कि माओवादी अपनी राह पर चल रहे हैं और सरकार अपने तरीके से विकास में जुटी हुई है. माओवादी चाहें भी तो सरकार के विकास कार्यक्रमों को पटरी से नीचे नहीं उतार सकते.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Jagdish [Vetale_jagdish@rediffmail.com ] Mumbai - 2012-03-01 07:42:27

 
  जयराम रमेश जी आपके विचार पूरी तरह सही है. जमीन से मिलने वाले पदार्थ की भी एक सीमा होती है. कल कहीं सरकार को हाथ फैलाने की जरूरत ना पड़े. और वहां के लोगों का गुस्सा भी कम हो सकता है. 
   
 

नदीम अख्तर [nadeemjagran@gmail.com] रांची - 2012-03-01 07:09:07

 
  आदिवासियों का विश्वास जीतना होगा
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश से द पब्लिक एजेंडा की बातचीत

क्या आपका मानना है कि झारखंड में नक्सली मजबूत हुए हैं?
बिल्कुल हुए हैं। यही वजह है कि हमने झारखंड के नक्सल-प्रभावित जिलों की संख्या 14 से बढ़ाकर 17 कर दी है। पहले गिरिडीह, खूंटी और रांची जिले इसमें शामिल नहीं थे, अब इन्हें भी जोड़ लिया गया है। इन जिलों में ग्रामीण कार्यों के लिए अलग से तीस-तीस करोड़ रुपये दिये जायेंगे।

सारंडा में अगर एक्शन प्लान सरकारी अधिकारी और पुलिस वाले ही लागू करेंगे, तो यह किस हद तक सफल हो पायेगा?
इस प्लान को लागू करने के लिए हमने सेल की मदद ली है। सेल के लोग एक माह के भीतर पांच हजार परिवार के बीच सात हजार साइकिल, सात हजार रेडियो और सात हजार सोलर लैंप बांटेंगे। काम तो राज्य सरकार को ही करना है, लेकिन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के एक नोडल अफसर भी पूरी योजना को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कराने के लिए मुस्तैद रहेंगे।

क्या आप पुलिस की ज्यादती को नक्सलवाद के फैलाव का प्रमुख कारण मानते हैं?
देखिए, नक्सलवाद एक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन से उत्पन्न विभेद का प्रतिफल है। इसे पुलिस की ज्यादती कहकर समेट देना ठीक नहीं होगा। पिछले पचास साल से सरकारों ने जो नीतियां तय की हैं, उन पर आदिवासियों का भरोसा नहीं हो पाया है। विस्थापन-पुनर्वास के सवालों को लेकर भी आक्रोश रहा है। हमें उनका भरोसा जीतना होगा। कहीं न कहीं यह भी एक महत्वपूर्ण कारण है नक्सलवाद के फैलाव का।
राज्य को केंद्र की ओर से अपेक्षित मदद नहीं मिलती। इस आरोप पर आप क्या कहेंगे?
अगले साल तक झारखंड में दो हजार किलोमीटर ग्रामीण सड़कें बनेंगी। हम सारंडा जैसे इलाकों के लिए एक्शन प्लान ला रहे हैं। यहां सफल हुआ, तो दूसरे नक्सल-प्रभावित इलाकों में भी ऐसी ही कार्ययोजनाएं लागू करेंगे। ये सब किसके लिए हो रहा है। मुझे झारखंड के साथ सौतेलेपन का आरोप बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित लगता है।

सरकारी अधिकारी यह नहीं पता कर पाते कि गरीब कौन है और किसे योजना का लाभ मिलना चाहिए, इसे कैसे ठीक किया जायेगा?
इसके लिए झारखंड में नया बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) सर्वे कराये जाने पर सहमति हुई है। अप्रैल के अंत तक सर्वे हो जायेगा। केंद्र से शीघ्र ही अधिकारियों की टीम भेजी जायेगी।

क्या केंद्र नक्सलियों से वार्ता की पहल करेगा?
हम कभी भी बातचीत के विरोधी नहीं रहे। मेरे सहयोगी केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम् ने कई बार कहा है कि हम वार्ता को तैयार हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि वार्ता किसके साथ की जाये? जो लोग संविधान को ही खारिज करते हैं, उनसे कैसे बातचीत हो सकती है?
 
   
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