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सचिन का शतक और देश का बजट

सचिन का शतक और देश का बजट

नई दिल्ली. 17 मार्च 2012

सचिन तेंदुलकर


अब भूख-प्यास और जीवन की जरुरतें महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं. कम से कम शुक्रवार और शनिवार को जिस तरह देश के आम बजट के बजाये सचिन के शतक का राग देश भर में बजता रहा, उससे तो यही साबित होता है. एक तरफ पूरे भारत के लोगों का रोज-रोज से जुड़ा आटा-दाल से लेकर जीडीपी तक का मामला बजट के रुप में सामने था, दूसरी ओर सौ-पचास मुनाफाखोर पेप्सी-कोला घरानों और सौ-पचास खिलाड़ियों से जुड़ा बाजारु मामला. लेकिन पूरे बाजार ने सचिन तेंदूलकर के शतक को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि देश का बजट पीछे रह गया.

बाजार ने किस तरह हमारी पूरी व्यवस्था को पीछे धकेल दिया है, सचिन तेंदूलकर के सौ के चक्कर में पिछले साल भर से हांफते-कांपते और अपना बीपी बढ़ाते चैनलों के बोलनकारों की बेचैनी को देख कर इसे बेहतर समझा जा सकता है. शतक पूरा करने के लिये 34 पारियों तक इस क्रिकेट के भगवान को मेहनत करनी पड़ी और जब शतक बन गया तो पूरा देश सचिन के बल्ले के नीचे दब कर रह गया.

यह सब कुछ तब हो रहा है, जब भारत मैच हार चुका है और हारने का एक शानदार रिकार्ड बनाता जा रहा है. अपराधी, सटोरिये और आतंकवादी तक इस खेल में गहरे तक धंसे हुए हैं. खिलाड़ी तक खेल में गंदगी फैलाने के लिये जेल की हवा खा चुके हैं. फिर बचा क्या है इस खेल में?

बाजार चलाने वाले जानते हैं कि इसी खेल के सहारे अभी भी एक उत्तेजना पैदा की जा सकती है. इसी खेल के सहारे युवाओं के सामने एक नया आदर्श गढ़ा जा सकता है. बाजार ने इसी खेल को एक बड़ा औजार बना रखा है, जिससे कि देश के करोड़ों युवा कम से सरकार और बाजार से सवाल न पूछने लग जायें. वे सड़कों पर उतर कर अपनी लड़ाई न लड़ने लग जायें. यह सरकार के लिये भी खतरनाक होगा और बाजार के लिये भी. ऐसे में आधुनिक बाजार का यह उत्पाद या क्रिकेट नामक ब्रांड बहुत कारगर है.

समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे का मानना है कि आज भारतीय क्रिकेट युद्धप्रिय राष्ट्रवाद और बाजार की ताकतों के जहरीले जोड़ के साथ एक ऐसे मुकाम पर खड़ा हुआ है जिसमें खेल के निर्मल आनंद की कोई जगह नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग अपने एक लेख में लिखते हैं कि क्रिकेट को लेकर मचाई जा रही अराजकता को किसी व्यक्ति या समूह के मत्थे मढ़कर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता. न ही यह कहकर पल्ला झाड़ा जा सकता है कि क्रिकेट के नशे को बढ़ावा किसी सोची-समझी साजिश के तहत दिया जा रहा है, जिसका कि उद्देश्य यह है कि आम जनता का ध्यान देश की मूलभूत समस्याओं से हटाया जा सके. ऐसा निश्चित ही हो भी रहा है. हजारों तरह की बीमारियों और लाखों किस्म की समस्याओं में उलझे होने के बावजूद हम कीड़ों-मकोड़ों की तरह रेंगते रहने के लिए तैयार हैं बशर्ते अपने नशे की पुड़िया हमें जरूरत के वक्त मिल सके....उस सट्टा बाजार का क्या होगा जिसमें अरबों की संपत्ति का जुआ खेला जाता है और एक संगठित माफिया जिसका किसी तीसरे देश में बैठकर संचालन करता है. उस भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का भी वजन क्या रह जाएगा जो आज अरबों रुपए की संपत्ति का मालिक बना बैठा है? और अंत में उन राजनेताओं का क्या होगा जो क्रिकेट के पिच पर वोटों की राजनीति के बड़े-बड़े स्कोर खड़े कर रहे हैं.


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