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28 रुपये रोज खर्च करने वाला गरीब नहीं

28 रुपये रोज खर्च करने वाला गरीब नहीं

नई दिल्ली. 19 मार्च 2012

गरीबी


26 रुपये रोज में दिन गुजारने की बात करने वाले योजना आयोग का कहना है कि देश में 2009-10 में देश में गरीबी का अनुपात घटकर 29.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है. बेशर्मी की सारी सीमाएं लांघने वाले मोंटेक सिंह अहलूवालिया की योजना आयोग ने कहा कि शहरों में 28.65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में दैनिक 22.42 रुपये से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है.

गरीबी रेखा के नये फार्मूले के अनुसार शहरों में महीने में 859.60 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 672.80 रुपये से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है. योजना आयोग ने अब गरीबी रेखा सीमा को उच्चतम न्यायालय में सौंपी गई रेखा से भी नीचे रखा है.

योजना आयोग ने इससे पहले उच्चतम न्यायालय में सौंपे शपथपत्र में कहा था कि जून 2011 के मूल्य स्तर के लिहाज से शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा को अनंतिम तौर पर प्रति व्यक्ति प्रति माह 965 रुपये 32 रुपये प्रतिदिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 781 रुपये प्रतिमाह यानी 26 रुपये प्रतिदिन रखा जा सकता है.

तेंदुलकर समिति ने गरीबी रेखाओं के संगणन और आद्यतन के लिए घरेलू उपभोक्ता व्यय के सर्वेक्षणों में निहित मूल्यों के प्रयोग की पहली बार सिफारिश की है. तेंदुलकर समिति ने वर्ष 2004-5 के लिए राज्य‍ वार गरीबी रेखाओं का आकलन करने के लिए निहित मूल्यों का प्रयोग करते हुए एक प्रणाली विकसित की है. तेंदुलकर समिति ने गरीबी की इन रेखाओं और मिश्रित संदर्भ अवधि एमआरपी पर आधारित मासिक प्रति व्यिक्ति उपभोक्ताओ व्यय के वितरण का प्रयोग करते हुए गरीबी रेखाओं का वर्ष 2004-5 के लिए अनुमान लगाया. समिति ने अपनी रिपोर्ट में 2004-5 की गरीबी रेखाओं को आद्यतन करने के लिए एक प्रणाली की सिफारिश की.

तेंदुलकर समिति की सिफारिशों के अनुसार फिशर मूल्य सूचकांकों का प्रयोग करते हुए वर्ष 2009-10 के लिए शहरी गरीबी रेखाओं का 2004-5 की राज्य वार मूल्य वृद्धि के आधार पर अद्यतन किया जाता है. 2009-10 में राज्य विशेष ग्रामीण रेखाओं का पता लगाने के लिए राज्य वार ग्रामीण-शहरी मूल्यर अंतर को प्रयोग में लाया गया है.

योजना आय़ोग का कहना है कि अखिल भारतीय आबादी अनुपात में 7.3 प्रतिशत अंकों की कमी आई है. यह 2004-5 के 37.2 प्रतिशत से 2009-10 में गिरकर 29.8 प्रतिशत रह गई है. ग्रामीण गरीबी में 8.0 प्रतिशत अंकों की कमी आई है. यह 41.8 प्रतिशत से कम होकर 33.8 प्रतिशत रह गई है और शहरी गरीबी में 4.8 प्रतिशत अंकों की कमी आई है और यह 25.7 प्रतिशत से कम होकर 20.9 प्रतिशत रह गई है. हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तराखंड में गरीबी का अनुपात लगभग 10 प्रतिशत अंकों से और उससे ज्यादा कम हुआ है. हालांकि असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड में वर्ष 2009-10 में गरीबी बढ़ी है. इसी तरह बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के अनुपात में मामूली गिरावट आई है.

सामाजिक समूहों के लिए गरीबी अनुपात
ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति में गरीबी के सबसे ऊंचे स्तर (47.4 प्रतिशत) का पता चलता है. इसके बाद अनुसूचित जाति (42.3 प्रतिशत) और अन्य पिछड़ी जातियों के (31.9 प्रतिशत) गरीबी का पता चलता है, जबकि सभी जातियों के लिए गरीबी का स्तर 33.8 प्रतिशत था.

• शहरी क्षेत्रों में अनुसूचित जाति का सबसे अधिक गरीबी एचसीआर 34.1 प्रतिशत है. उसके बाद अनुसूचित जनजाति 30.4 प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्ग 24.3 प्रतिशत हैं, जबकि सभी जातियों के लिए यह 20.9 प्रतिशत है.

• बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जाति और जनजाति परिवारों का (एचसीआर) का लगभग दो तिहाई गरीब हैं, जबकि मणिपुर, ओडिशा और उत्तउरप्रदेश जैसे राज्यों में इन समूहों के लिए गरीबी अनुपात आधे से भी अधिक है.

धार्मिक समूहों में एचसीआर
• ग्रामीण क्षेत्रों में सिक्खोंप का सबसे कम एचसीआर 11.9 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में गरीबों की सबसे कम आबादी ईसाइयों की 12.9 प्रतिशत है.

• ग्रामीण क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी (एचसीआर) असम जैसे राज्यों में सबसे अधिक 53.6 प्रतिशत, उत्तंरप्रदेश में 44.4 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल 34.4 प्रतिशत और गुजरात में 31.4 प्रतिशत है.

• शहरी क्षेत्रों में अखिल भारतीय स्तर पर मुसलमानों का गरीबी अनुपात 33.9 प्रतिशत है. शहरी क्षेत्रों के लिए मुसलमानों का गरीबी अनुपात राजस्थान में 29.5 प्रतिशत, उत्तरप्रदेश में 49.5 प्रतिशत, गुजरात में 42.4 प्रतिशत, बिहार में 56.5 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 34.9 प्रतिशत है.

व्यावसायिक वर्गों में एचसीआर
• ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि मजदूरों का लगभग 50 प्रतिशत और अन्य मजदूरों का 40 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे है, जबकि शहरी क्षेत्रों में अनुबंध आधार पर काम करने वाले मजदूरों का गरीबी अनुपात 47.1 प्रतिशत है.

• अपेक्षा के अनुसार नियमित मजदूरी/वेतनभोगी लोगों में गरीबों का सबसे कम अनुपात है. कृषि की दृष्टि से समृद्ध राज्य हरियाणा में 55.9 प्रतिशत खेतिहर मजदूर गरीब है, जबकि पंजाब में यह आंकड़ा 35.6 प्रतिशत है.

• शहरी क्षेत्रों में अनुबंध पर काम करने वालों मजदूरों का एचसीआर बिहार में 86 प्रतिशत, असम में 89 प्रतिशत, ओडिशा में 58.8 प्रतिशत, पंजाब में 56.3 प्रतिशत, उत्तरप्रदेश में 67.6 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 53.7 प्रतिशत है.

परिवार के मुखिया के शिक्षा स्तर पर आधारित एचसीआर
• अपेक्षा के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर वाले और कम शिक्षा वाले परिवारों में गरीबी का सबसे ऊँचा अनुपात है, जबकि माध्यमिक और उच्चम शिक्षा वाले परिवारों की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है. बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर और कम शिक्षा वाले परिवारों का लगभग दो-तिहाई लोग गरीब हैं, जबकि उत्तरप्रदेश में यह आंकड़ा 46.8 प्रतिशत और ओडिशा के लिए 47.5 प्रतिशत है.

• शहरी क्षेत्रों में भी इससे मेल खाती हुई स्थिति है.

परिवार के मुखिया की आयु और लिंग पर आधारित वर्गों के लिए एचसीआर
• ग्रामीण क्षेत्रों में यह देखा गया है कि जिन परिवारों के मुखिया नाबालिग हैं उनमें गरीबी का अनुपात 16.7 प्रतिशत और महिलाओं तथा वरिष्ठं नागरिकों के रूप में मुखियाओं वाले परिवारों में गरीबी का अनुपात क्रमश: 29.4 प्रतिशत और 30.3 प्रतिशत है.

• शहरी क्षेत्रों में नाबालिगों के रूप में मुखियाओं वाले परिवारों में गरीबी का अनुपात 15.7 प्रतिशत और महिलाओं तथा वरिष्ठब नागरिकों के रूप में मुखियाओं वाले परिवारों में गरीबी का अनुपात क्रमश: 22.1 प्रतिशत और 20.0 प्रतिशत है, जबकि कुल मिलाकर गरीबी का अनुपात 20.9 प्रतिशत है.


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