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सनी लियोन का शास्त्र और जिस्म 2

सनी लियोन का शास्त्र और जिस्म 2

नई दिल्ली. 30 मार्च 2012

सनी लियोन


हिंदी फिल्म जगत में इन दिनों सैकड़ों की संख्या में फिल्में बन रही हैं लेकिन इनमें सबसे अधिक किसी की चर्चा हो रही है तो वह है फ्रेम दर फ्रेम हालीवुड की फिल्मों की नकल करने वाले महेश भट्ट और उनकी हीरोइन सनी लियोन की. महेश भट्ट बार-बार अपनी नई फिल्म जिस्म-2 को आध्यात्म और भारतीयता से जोड़ने वाली फिल्म के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं तो दूसरी ओर सनी लियोन की पोर्न फिल्मों को भी भट्ट कैंप प्रचारित कर रहा है. यह वह दौर है, जब भारत में पोर्न फिल्मों का व्यवसाय अरबों रुपये को पार कर रहा है.हालांकि सनी लियोन का कहना है कि अगर मुझे साल के 365 दिन बॉलीवुड व्यस्त रखेगा तो मैं हिंदी फिल्मों के अलावा और कुछ नहीं करूंगी.

सनी लियोन को आपत्ति है कि उन्हें केवल पोर्न स्टार के बतौर याद किया जा रहा है, जबकि वो इससे कहीं अधिक अभिनय के लिये याद किया जाना चाहती हैं. पाठकों को याद होगा, राजकपूर की राम तेरी गंगा मैली नामक फिल्म पर काफी हंगामा मचा था और मंदाकनी रातों-रात मशहूर हो गई थीं. 1985 के दौर की इस फिल्म को लेकर लोग देविका रानी और अशोक कुमार के दिन याद कर रहे थे. हालांकि इससे पहले राजकपूर सत्यम् शिवम् सुंदरम् में भी देह दिखाने के प्रयोग कर चुके थे और मेरा नाम जोकर में भी.

भारत में नई पीढ़ी के पास तब इंटरनेट नहीं था और पोर्न या सेमी पोर्न फिल्में छोटे शहरों के सिनेमाघरों तक नहीं पहुंचती थी. लेकिन 1985 के बाद तो भारतीय फिल्म जगत ने जैसे सारे बंधन तोड़ दिये. दक्षिण की देहदिखाउ फिल्में शर्मानें लगीं. तर्क दिया गया कि यह सीन की डिमांड थी. लेकिन धीरे-धीरे ऐसे तर्क भी गैरजरुरी मान लिये गये. दस साल बाद 1995 में बैंडिट क्वीन संभवतः ऐसे किसी तर्क के साथ चिपकी अंतिम फिल्म थी.

एक छोटी-सी लव स्‍टोरी जैसी फिल्मों ने भी सिर्फ अपनी नग्नता के चर्चों के कारण बाक्स ऑफिस पर चर्चा बनाई. इसके आगे-पीछे आई 1996 की कामसूत्र ने सब कुछ साफ-साफ रख दिया. कहीं कोई लेकिन-वेकिन, किंतु-परंतु नहीं बचे. मीरा नायर को इस फिल्म ने वह सब कुछ दिला दिया, जिसके लिये वो कई सालों से उम्मीद लगाए बैठी थीं. दीपा शाही की फिल्म फायर का किस्सा भी कुछ ऐसा ही रहा. बाद में वाटर आई, लोगों को लगा कि फिल्म पानी की समस्या पर होगी. लेकिन फिल्म बाल विधवाओं के शोषण पर थी. इन सभी फिल्मों में हालांकि कोशिश थी कि भारतीय समाज के कुछ अनछुये पहलू को सामने रख दिया जाये.

लेकिन अमित सक्‍सेना की जिस्‍म जैसी फिल्मों के संदेश बहुत साफ थे. हीरोइनों के बयान शीर्ष पर थे कि अगर अच्छी देह है तो उसे दिखाने में हर्ज क्या. बिपासा बसु और जॉन अब्राहम ऐसी फिल्मों के प्रतीक बन गये. गोविंद मेनन ख्‍वाहिश जैसी फिल्मों के साथ मल्लिका शहरावत की देह दिखाउ प्रतिभा को भुना रहे थे. फिर विषय धीरे-धीरे और खुलने लगे. लव, सेक्‍स और धोखा अंततः ऐसी फिल्मों की श्रेणी में ही रखी गयी. फिल्म मिस्टर सिंह एंड मिसेज मेहता को प्रवेश भारद्वाज ने तार्किक बनाने की पूरी कोशिश की लेकिन फिल्म सिनेमाघर में जा कर दर्शक नहीं जुटा पाई. लेकिन फिल्म चर्चा में जरुर रही. इसी कथानक के आसपास बनी मर्डर ने दर्शक भी जुटाये और पैसे भी.

सनी लियोन को अपनी हिंदी फिल्म में लाकर महेश भट्ट खेमा भी ऐसा ही कुछ करना चाहता है. लेकिन फिल्मों की कतर-ब्योंत से जुड़े लोगों का सहना है कि अब कमसे कम देह के नाम पर दर्शकों को आप सिनेमाघर तक नहीं ला सकते. देह के खुलापन का हाल ये है कि दर्शकों के पास अब सारे विकल्प मौजूद हैं. ऐसे में केवल देह देखने के उद्देश्य से 3 घंटे का समय बर्बाद नहीं करेगा. वैसे दूर की कौड़ी लाने वालों का कहना है कि महेश भट्ट खेमा, सनी लियोन को केवल प्रचार के लिये मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है. फिल्म में न तो सनी लियोन की कोई खास भूमिका है और ना ही जरुरत. लेकिन भट्ट को चर्चा तो मिल ही रही है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

maruf [mdmarufansari@rediffmail.com] dhanbad - 2012-04-02 08:51:01

 
  हमें बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब भारतीय संस्कॉति में भी अश्लीलता बेमानी हो गई है.  
   
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