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हमेशा याद रहेंगे मान्नादा

हमेशा याद रहेंगे मान्नादा

कोलकाता. 31 मार्च 2012 गंगानन्द झा

शैलेन्द्रनाथ मन्ना


आमतौर पर खिलाड़ी अपने खेल के साथ ही ओझल हो जाते हैं लेकिन दिग्गज फुटबॉल खिलाड़ी शैलेन्द्रनाथ मन्ना के साथ ऐसा नहीं हुआ. 87 साल की उम्र में जब पिछले महीने 27 फरवरी को उनका निधन हुआ तो उन्हें प्रेम करने वाले हजारों लोग उनकी शवयात्रा में शामिल हुये. आम तौर पर फुटबॉल खिलाड़ी प्लेबॉय, रसिक, विख्यात व्यक्ति, नस्लवादी व्यक्ति, अरबपति, फैशन मॉडल और बिगड़े नवाब होते रहे हैं. लेकिन शैलेन मन्ना एक अपवाद के रुप में उस वर्ग में एक संत के तौर पर ख्यात थे.

सन 1951 ई में भारत की टीम ने एशियाई खेलों में पहला स्वर्ण पदक जीता था. इस टीम के अधिनायक थे शैलेन्द्रनाथ मन्ना. छोटी सी अवधि के लिए फुटबॉल के खेल में भारत विश्व स्तर की ख्याति एवं सम्मान का स्थान बनाए रखने में कामयाब था.

मन्ना नंगे पैर खेलते थे. बाद में मन्ना ने स्वीकार किया था कि नंगे पैर खेलने में तकलीफ होती थी. कलकत्ता के केन्द्र में अवस्थित उनके क्लब मोहन बागान के विशाल झुलसे हुए खेल के मैदान में, जहाँ सबसे बड़े जोखिम टूटे हुए शीशे और आवारा घूमती बकरियाँ होती थीं, खेलने में उन्हें परेशानी नहीं होती थी. पर जब वे महाराष्ट्र गए तो मन्ना ने अपने विरोधी टीम के खिलाड़ियों को बूट पहनकर दक्षता से खेलते हुए देखा. ब्रिटिश हुकुमत के आखिरी दिनों में अंग्रेज तथा एंग्लो इण्डियन टीमों के खिलाड़ियों ने अनगिनत बार इनके घुटने और टखने पर घात लगाकर हमला किया और कुचला होगा. इनके अँगूठे के नाखून कितनी ही बार उखड़ते रहे थे. एंक्लेट्स एवं प्लास्टर्स और कभी कभी मोजों से बचाव होता था. लेकिन गोरे साहबों को उनके ही खेल में हराने के आनन्द से दर्द का एहसास घटता रहता था.

नंगे पांव की वजहें, उनके अपने दिमाग में भी, बदला करती थीं. अधिकतर बंगाली लड़कों की तरह वे बूट का खर्च उठाने की बात सोच भी नहीं सकते थे. उस वक्त फुटबॉल से आमदनी नहीं होती थी. मोहन बागान उनको वेतन नहीं देता था. मैरुन और हरे रंग की जर्सी वे अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदते थे. लेकिन जब ओलम्पिक खेलों में उनकी टीम की (बूट से युक्त) फ्रांस से हुई शानदार हार के बाद खूबसूरत राजकुमारी मार्गेरेट ने बकिंघम पैलेस में उनसे पूछा कि क्या उन्हें नंगे पाँव खेलने में डर नहीं लगता, तो उन्होंने गरीबी का जिक्र नहीं किया. उन्होंने कहा कि वे बस ऐसे ही खेलना पसन्द करते हैं. इससे बॉल को नियन्त्रण में रखने में सहूलियत होती है.

इस वार्तालाप के इर्दगिर्द कहानियाँ बनने लग गईं. कुछ लोगों ने कहा कि मान्नादा ने राजकुमारी से कहा था कि ताकत तो दिमाग में रहती है. एक कहानी गढ़ी गई कि सम्राट छठे जॉर्ज ने यह देखने के लिए कि कहीं उनके पाँव इस्पात के बने तो नहीं हैं, उनके पैंट को उपर मुड़वाकर देखा था. बाद के विवरण बतलाते हैं कि उन्होंने बर्फ से भरे मैदान में भी खेला था. यह बात तो सही है कि अगले हेलसिंकी ऑलिम्पिक में उनके खेलने के पहले खेल के मैदान से बर्फ के फाहे हटाए गए थे. तब तक बूट का पहनाना अनिवार्य कर दिया गया था. फिर भी कुछ खिलाड़ियों के पाँव पाले से सुन्न हो गए थे और वे युगोस्लाविया से 10-1 से हार गए थे.

हालांकि इस हार के बाद भी मान्नादा अपने प्रशंसकों के लिए पूरी जिन्दगी, चुस्त, फुर्तीले और निपुण बने रहे थे.उनके पाँव अनेक गुणों के लिए उपमा बन गए थे. वे सावधानी से भद्र व्यक्ति की भाँति खेलते थे. बीस साल की खिलाड़ी की जिन्दगी के दौरान कभी उन पर उँगली नहीं उठी, कभी भी उन्होंने शपथ नहीं खाई. कभी किसी पर फाउल नहीं किया. कैप्टन के रूप में कभी खिलाड़ियों से ऊँची आवाज में बात नहीं की. उन्होंने अपने उदाहरण से उन्हें अनुशासित किया. उनके खाने के पहले कभी खुद नहीं खाया. यद्यपि शायद ही कभी अपने विपक्षियों को उन्होंने अपने से आगे बढ़ने दिया हो, खेल के मैदान के बाहर, मोहन बागान का प्रमुख स्थानीय प्रतिद्वन्द्वी इस्ट बंगाल के सदस्य भी, उनके अच्छे दोस्त हुआ करते थे.

एक बार का वाकया है, मोहन बागान की भिड़न्त बॉर्डर सिक्युरिटी फोर्स की टीम के साथ हुई थी. मैच बराबरी पर रहा. मोहन बागान की टीम को बॉर्डर सिक्युरिटी फोर्स की टीम ने इतने शातिर तरीके से चोटिल किया था कि फिर से हुए खेल में मोहन बागान की टीम नहीं भाग ले सकी. थी. मान्नादा ने खेल देखने आई 2000 लोगों की क्रुद्ध भीड़ को शान्त किया था और बॉर्डर सिक्युरिटी फोर्स की टीम को अपनी शुभकामनाएँ दी थीं.

मान्नादा पाँच दशकों तक मोहन बागान से खिलाड़ी, कोच सहायक सचिव जैसे पदों के साथ जुड़े रहे. सन 1942 में उन्होंने मोहन बागान में कुल उन्नीस रुपयों की आमदनी पर योगदान किया, अन्यथा उनकी आजीविका का साधन ज्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया की नौकरी ही थी.

इंग्लैंड फुटबॉल एसोसिएशन ने उन्हें दुनिया के दस श्रेष्ठतम कप्तानों में शामिल किया तो 70 के दशक में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा. उम्र के आखरी पड़ाव में ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने उन्हें सदी का फुटबॉलर घोषित करते हुये सम्मानित किया. लेकिन इन सम्मानों ने कभी उनके अंदर रत्ती भर अहंकार नहीं पैदा होने दिया. पूर्वी कोलकाता के सॉल्ट लेक में उनका फ्लैट किसी महान फुटबॉल खिलाड़ी के आवास की तरह नहीं लगता. एशियाई खेलों के अपने स्वर्ण पदक को उन्होंने सरकार को दान कर दिया था. हालाँकि वह पदक स्वयं पण्डित नेहरू ने अपने हाथों इन्हें दिया था. अपने टीम के टाइ और ब्लेज़र्ज को उन्होंने चैरिटी में दे गिया था. उनके पास बच गई थीं एक या दो तस्वीरें और एक खाली कप बोर्ड, जिस पर उनसे मिलने आए हुए दोस्तों के संदेश खुदे हुए थे.

इण्टरव्यू करनेवालों से वृद्धावस्था में उन्होंने कहा था कि उनकी सारी यादें इतने बेशकीमती हैं कि उन्हें और किस चीज की जरूरत नहीं. लंदन ऑलिम्पिंक में फ्रांस के विरुद्ध पहला पेनाल्टी गोल चूक जाने का और फिर दूसरा पेनाल्टी गोल चूक जाने की आशंका से इंकार करने का अफसोस उन्हें अन्त तक रहा. सन 1950 में ब्राजील में आयोजित वर्ल्ड कप में शैलेन मन्ना के अधिनायकत्व में भारत की टीम नहीं गई थी, क्योंकि भारतीय फुटबॉल फेडरेशन ने इसका महत्व नहीं समझा था. उन्हें भी अफसोस था कि भारत एशियाई खेलों में अच्छा नहीं कर रहा था. पर वे राष्ट्र में फुटबॉल के प्रति आशावान रहते हुए जीवित रहे.


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