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खतरे में हैं बैगा आदिवासी

खतरे में हैं बैगा आदिवासी

7 अप्रैल 2012. आलोक प्रकाश पुतुल. बीबीसी

बैगा आदिवासी


छत्तीसगढ़ में विशेष संरक्षित बैगा आदिवासियों के परिवार नियोजन के लिये नसबंदी का सनसनीखेज मामला सामने आया है. पिछले कुछ सालों से इस जनजाति की जनसंख्या लगातार कम होती चली गई है.

यही कारण है कि 1998 में केंद्र सरकार के निर्देश पर छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियों बैगा, अबुझमाड़िया, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा और कमार के परिवार नियोजन पर पूरी तरह से प्रतिबंध है. लेकिन यह प्रतिबंध बेअसर साबित हुआ है.

राज्य के बिलासपुर, मुंगेली और कबीरधाम जिले में बैगा आदिवासियों की नसबंदी के ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिनमें जानते-समझते हुए भी बैगा आदिवासियों की नसबंदी कर दी गई है.

सरकार के ताजातरीन आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में बैगाओं की कुल जनसंख्या 42,838 है. लगातार घटती जनसंख्या को ध्यान में रख कर सरकार बैगा आदिवासियों के लिये कई परियोजनायें चला रही है. खास तौर पर बनाये गए बैगा परियोजना के तहत बैगा बहुल मुंगेली और बिलासपुर जिले में 241.56 लाख रुपये खर्च किए गये हैं. इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से भी 614 लाख रुपये इन बैगाओं पर खर्च किये जाने के आंकड़े हैं लेकिन दूसरी ओर स्वास्थ्य महकमा बैगाओं की घटती आबादी को लेकर मिले आदेशों की लगातार अनदेखी कर रहा है.

राज्य के मुंगेली जिले में बैगा आदिवासियों की नसबंदी के सर्वाधिक मामले सामने आए हैं. लेकिन अफसरों का दावा है कि पिछले साल नवंबर में एक मामला सामने आया था, जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग को इस मामले में और सख्ती बरतने के निर्देश दिए गये थे. बैगा बहुल लोरमी के स्वास्थ्य केंद्र अधिकारी डाक्टर सीएम पाटले मानते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में बैगा आदिवासियों की नसबंदी पिछले कई सालों से होती रही है. पाटले कहते हैं, "नवंबर महीने में मेरे पदभार ग्रहण ग्रहण के अगले ही दिन एक बैगा आदिवासी की नसबंदी का मामला मेरी जानकारी में आया था, जिसके बाद मैंने इस पर पूरी तरह से रोक लगा दी है."

प्रतिबंध बेअसर
पाटले का दावा है कि इस साल बैगाओं की नसबंदी का एक भी मामला उनकी नजर में नहीं आया है. लेकिन मुंगेली जिले के दूसरे स्वास्थ्य केंद्रों का हाल ऐसा नहीं है. इसके अलावा बिलासपुर, कबीरधाम और पड़ोसी जिले डिंडौरी के इलाके में भी बैगा आदिवासियों की नसबंदी धड़ल्ले से जारी है.

मुंगेली जिले के ही डूड़वाडोगरी की लमिया ने पिछले महीने नसबंदी का ऑपरेशन कराया है. उनके दो बच्चे हैं, बड़े बच्चे की उम्र 3 साल है, जबकि छोटी बेटी अभी दुधमुंही है.

लमिया का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी में बैठकर वे डिंडौरी के गोरखपुर स्वास्थ्य केंद्र तक गई थीं, जहां उनका ऑपरेशन किया गया. उन्हें ऑपरेशन के बाद एक हजार रुपये भी मिले. उनके पति विश्राम बैगा नसबंदी के ऑपरेशन के लिये अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हैं.

बेहद कम उम्र की दिखने वाली विश्राम की पत्नी लमिया कहती हैं, "दो बच्चों को पालना ही हमारे लिये मुश्किल का काम है. ऐसे में नसबंदी का ऑपरेशन कराने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं था."

उनके साथ इलाके की कई दूसरी बैगा महिलाओं ने भी नसबंदी का ऑपरेशन कराया, जिसकी सूत्रधार गांव की ही फगनी बैगा बनीं.

तीन बच्चों की मां फगनी ने लगभग 10 साल पहले एक सरकारी कैंप में ही ऑपरेशन करवाया था. उनके पति संचू ने उन्हें साफ कह दिया था कि अगर और बच्चे हुए तो खैर नहीं. पति का कहना था कि उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे और बच्चों का पालन-पोषण कर सकें. फगनी मुस्कुराते हुए कहती हैं, "मेरे पति ने कहा कि ऑपरेशन कराओ वरना बच्चे पैदा हुए तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा."

फगनी का कहना है कि पहले गांव में आने वाली स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही इन महिलाओं को नसबंदी का ऑपरेशन कराने के लिये ले जाया करती थीं लेकिन उन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के कहने पर अब वे भी गांव की बैगा महिलाओं को नसबंदी ऑपरेशन के लिये ले जाती हैं.

मुद्दा ग़रीबी का
फगनी बैगा के साथ स्वास्थ्य केंद्र पर जा कर नसबंदी कराने वाली महिलाओं को 600 रुपये और प्रोत्साहन राशि के तौर पर उन्हें 150 रुपये की रकम मिलती है.

हालांकि अब पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के डिंडौरी में नसबंदी का ऑपरेशन कराने पर ऑपरेशन कराने वाली महिला को हजार रुपये और उसे प्रोत्साहित करने वाले को 400 रुपये की रकम मिलती है. ऐसे में इलाके के लोग डिंडौरी में नसबंदी ऑपरेशन कराने को प्राथमिकता देते हैं. गौरतलब है मध्यप्रदेश में भी बैगाओं की नसबंदी पूरी तरह से प्रतिबंधित है. लेकिन कई बैगा आदिवासियों का कहना है कि उनके सामने गरीबी इतना बड़ा मुद्दा है कि परिवार वृद्धि को रोकना उनके लिए जरुरी है.

मंजूरहा गांव की कमला बैगा के तीन बच्चे पहले से ही हैं. जब चौथा बच्चा पैदा हुआ तो घर की हालत देखते हुये उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही नसबंदी का ऑपरेशन करा लिया. कमला बैगा कहती हैं, "बैगाओं की नसबंदी पर रोक का हमें पता है लेकिन नसबंदी न करायें तो इतने बड़े परिवार को पालना संभव नहीं है."

बैगा आदिवासी


उनकी बात का समर्थन करते हुये गांव के ही चैन सिंह की पत्नी शांति बैगा कहती हैं कि नसबंदी पर प्रतिबंध होने के बाद भी गरीब बैगाओं को ऑपरेशन कराना पड़ता है.

हाल ही में अपना ऑपरेशन कराने वाली शांति बताती हैं, "कुछ स्वास्थ्य केंद्र में हमारी नसबंदी के ऑपरेशन को लेकर मनाही है लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है. अगर सरकार को लगता है कि हमारी नसबंदी नहीं हो तो सरकार को हमारी गरीबी के बारे में भी सोचना चाहिए."

गोदना है पहचान
लोरमी स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत एक पुराने कर्मचारी का कहना है कि कई बार बैगा महिलायें अपने को गौंड आदिवासी बता कर नसबंदी का ऑपरेशन करा लेती हैं, ऐसे में भला स्वास्थ्य विभाग क्या कर सकता है. लेकिन बैगाओं के बीच काम करने वाले इसी जनजाति के मोती सिंह बैगा कहते हैं, "बैगा महिलाओं के पूरे ललाट पर खास किस्म का गोदना गुदा रहता है. ऐसे में यह कहना कि वे अपनी पहचान छुपा लेती हैं, बहुत ही हास्यास्पद तर्क है."

पिछले साल लोरमी स्वास्थ्य केंद्र में ही अपनी नसबंदी कराने वाली बाबूलाल बैगा की पत्नी बयन बैगा का कहना है कि उन्होंने साफ-साफ सरकारी दस्तावेजों में अपनी जाति बैगा दर्ज कराई है. उनके पास भी जो स्वास्थ्य विभाग के दस्तावेज हैं, उसमें उन्हें बैगा आदिवासी के तौर पर ही दर्ज किया गया है.

ट्राइबल वेलफेयर सोसायटी के प्रवीण पटेल का कहना है कि बैगा आदिवासी देश में पारंपरिक दवाइयों के निर्माण के लिए हजारों साल से जाने जाते रहे हैं. लेकिन आज हालत ये है कि जंगल से बेदखल हो गए बैगा दो जून की रोटी में ही उलझे हुए हैं.

प्रवीण पटेल कहते हैं, "बैगाओं के लिये न रोजगार है और न ही उनकी परंपरा को संरक्षित रखने के लिये सरकार के पास कोई योजना. ऐसे में हज़ार रुपये का मोह सहज रुप से उन्हें अपनी ओर खींचता है."

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में काम करने वाली बैगा महापंचायत की संयोजक रश्मि, बैगा आदिवासियों के नसबंदी ऑपरेशन को पूरी तरह से बैगाओं की गरीबी और सरकारी महकमे द्वारा अधिक से अधिक ऑपरेशन करने की होड़ को मानती हैं.

रश्मि का कहना है कि 1969 में जब भारत सरकार ने 75 आदिवासी समुदायों को विशेष संरक्षित आदिवासियों की श्रेणी में शामिल किया था, उसके बाद से स्वास्थ्य विभाग को हर साल आदिवासियों की जनसंख्या को लेकर दिशा निर्देश जारी किये जाने थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. नए स्वास्थ्य अधिकारियों को पता ही नहीं है कि संरक्षित जनजातियों की नसबंदी पर प्रतिबंध है.

कबीरधाम ज़िले के कलेक्टर मुकेश बंसल का कहना है कि कुछ समय पहले बैगा आदिवासियों की नसबंदी के मामले जांच के बाद सही पाए गये थे. मुकेश बंसल के अनुसार 1984-85 के मध्यप्रदेश सरकार के निर्देशों में हालांकि कबीरधाम जिले के बोड़ला और कवर्धा विकासखंड का उल्लेख नहीं था, फिर भी उन्होंने राज्य सरकार को इस संबंध में पत्र लिखा था, जो अब तक अनुत्तरित है.

मुकेश बंसल कहते हैं, "कई सरकारी योजनाएं ऐसी हैं, जिनमें चार से अधिक सदस्यों के होने पर उनका लाभ बैगाओं को नहीं मिल पाता. बैगाओं में जागरुकता आई है और वे खुद नसबंदी कराना चाहते हैं."

जाहिर है, गरीबी, अज्ञानता और सरकारी दिशा-निर्देशों के बीच ढ़ेर सारे सवाल हैं, जिनके बीच सब कुछ सरकारी तरीके से चल रहा है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

neeraj [abc.neeraj1970@gmail.com] jabalpur - 2012-04-07 16:00:43

 
  आलोक जी, बैगा या ये सभी जातियां.. क्या संग्रहालय में सहेजने की वस्तुएं हैं. जब ये अपना परिवार पाल ही नहीं पा रहे हैं तब क्या ये बुरा विकल्प है? आप कुछ ज्यादा बुनियादी तकलीफों तक पहुंचे तो ज्यादा अच्छा.. और भी गम है जमाने में, छत्तीसगढ़ के बाग और बैगाओं को छोड़ के. 
   
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