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ममता राज में मार्क्स बाहर

ममता राज में मार्क्स बाहर

कोलकाता. 7 अप्रैल 2012

कार्ल मार्क्स


पश्चिम बंगाल के स्कूलों में पाठ्यक्रम से कम्युनिज्म के जनक कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स को बाहर करने की सरकार की योजना का चौतरफा विरोध हो रहा है. देश की वामपंथी पार्टियों ने तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस निर्णय की कड़ी आलोचना करते हुये कहा है कि इस तरह इतिहास से छेड़छाड़ करना विद्यार्थियों को इतिहास के समस्त पहलुओं से वंचित करना है.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के मौजूदा सिलेबस में मार्क्स पर पूरा पाठ है. कक्षा 8वीं, 11वीं और 12वीं के औद्योगिक क्रांति के पाठ में मार्क्स और उनका योगदान पढ़ाया जाता है. अब राज्य की स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम समिति ने कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स का पाठ स्कूली किताबों से हटाने की सिफारिश की है.

स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम समिति के अध्यक्ष अवीक मजूमदार का कहना है कि पश्चिम बंगाल में इतिहास के पाठ्यक्रम में एक विचारधारा विशेष को अहमियत दी गई है, जिसे अब संतुलित करने का प्रयास किया जा रहा है. मजूमदार ने कहा कि यदि किसी चीज की अधिकता है तो उसे हटाया जाएगा.

जाहिर है, यह सब कुछ तृणमूल कांग्रेस के निर्देश पर ही हो रहा है. तृणमूल सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने इस मुद्दे पर अपनी पार्टी की लाईन स्पष्ट करते हुये कहा कि इतिहास की किताब को संतुलित करने की जरूरत है. इतिहास बोलशेविक से शुरू होकर ज्योति बसु पर खत्म नहीं होता. मेरा मानना है कि मार्क्स को ऐतिहासिक विषय के रूप में पढ़ाना चाहिए, लेकिन महात्मा गांधी और मंडेला की कीमत पर नहीं. उन्होंने कहा कि चौथी से लेकर 12वीं तक हर क्लास में मार्क्सवाद के चैप्टर हैं, इसे ठीक करने की जरूरत है.

सरकार के इस निर्णय से वाम दल बेहद नाराज हैं. वामपंथी नेता और लोकसभा के स्पीकर रहे सोमनाथ चटर्जी का कहना था कि मुझे नहीं मालूम कि इतिहास के पाठ्यक्रम से विश्व इतिहास के अध्यायों को हटाने की सलाह मुख्यमंत्री को कौन दे रहा है. लेकिन यह निश्चित तौर पर एक गलत और विवादास्पद फैसला है. माना जा रहा है कि सरकार के इस कदम को लेकर राज्य में वामपंथी पार्टियां कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन कर सकती हैं.


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