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24 साल बाद सू ची की विदेश यात्रा

24 साल बाद सू ची की विदेश यात्रा

यंगून. 19 अप्रैल 2012 बीबीसी

आंग सान सू ची


बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची 24 सालों में पहली बार विदेश यात्रा करनेवाली हैं. वे नॉर्वे और ब्रिटेन जाएँगी. भारत और चीन ने भी उन्हें निमंत्रण दिया था. नॉर्वे के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वे जून में नॉर्वे की राजधानी ओस्लो जाएँगी.

सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के एक प्रवक्ता ने कहा है कि सू ची नॉर्वे और ब्रिटेन की यात्रा की योजना बना रही हैं.

बर्मी नेता ने 15 साल हिरासत और नज़रबंदी में बिताए हैं. उन्होंने इसके पहले विदेश जाने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें इस बात की आशंका थी कि बर्मा के सैनिक शासक शायद उन्हें देश लौटने से रोक दें. मगर इस महीने उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन से कहा था कि वे अब विदेश जाने के बारे में विचार कर सकती हैं क्योंकि बर्मा में राजनीतिक सुधार हो रहे हैं.

डेविडक कैमरन ने पिछले सप्ताह बर्मा की यात्रा के दौरान आंग सान सू ची को ब्रिटेन आने का निमंत्रण दिया था. इससे पहले भारत और चीन ने भी उन्हें अपने यहाँ आने का निमंत्रण दिया था.

भारत के साथ सू ची के पुराने संबंध रहे हैं. उनकी माँ भारत में बर्मा की राजदूत थीं और सू ची ने स्वयं दिल्ली में स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई की है. बाद में उन्होंने ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई की जहाँ उनकी मुलाक़ात अपने ब्रिटिश पति माइकेल ऐरिस से हुई.

बर्मा की स्वतंत्रता के नायक जेनरल आंग सान की बेटी सू ची ने ब्रिटेन में पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ समय जापान और भूटान में बताया और उसके बाद वे अपने दो बच्चों के साथ ब्रिटेन में बस गईं. बाद में 1988 में वे अपनी बीमार माँ की देखभाल करने के लिए बर्मा लौट गईं.

वहाँ 1988 में एक जनविद्रोह हुआ और इसी दौरान वो एक लोकतंत्र समर्थ नेता के तौर पर उभरकर आईं. सैनिक शासकों ने इसके बाद उन्हें उनके घर में नज़रबंद कर दिया. पिछले दो दशक में उन्होंने अधिकतर समय किसी ना किसी तरह की हिरासत में बिताया है. बर्मा में 1990 में हुए चुनाव में उनकी पार्टी- एनएलडी को जीत मिली मगर उसे सत्ता नहीं सौंपी गई.

1991 में सू ची को उनके लोकतंत्र समर्थक प्रयासों के लिए प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया मगर वे पुरस्कार ग्रहण करने ओस्लो नहीं जा पाईं. बाद में उनके पति की बीमारी के समय सैन्य अधिकारियों ने उन्हें ब्रिटेन जाने की अनुमति दी मगर उन्हें ये आशंका थी कि शायद देश छोड़ने पर उनको दोबारा लौटने नहीं दिया जा सकता और इसलिए वो नहीं गईं. बाद में मार्च 1999 में उनकी कैंसर से मृत्यु हो गई.

सू ची को नवंबर 2010 में नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया. उनकी रिहाई बर्मा में चुनाव के तुरंत बाद हुई जिसके बाद वहाँ सैन्य समर्थन वाली मगर राजनीतिक सुधार की आकांक्षी एक सरकार सत्ता में आई. इसके बाद से बर्मा में कई सुधार हुए हैं और इनके तहत सैकड़ों राजनीतिक बंदियों की रिहाई भी हुई है.

2010 के चुनाव का बहिष्कार करनेवाली उनकी पार्टी ने दोबारा राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हो गई है. इसी महीने बर्मा में उपचुनाव हुए जिसमें सू ची भी जीतकर संसद पहुँचीं. उनकी पार्टी को 45 में से 43 सीटों पर जीत मिली. हाल के समय में पश्चिमी देशों ने भी बर्मा पर लगाए गए कई प्रतिबंधों में ढील देने की घोषणाएँ की हैं.


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