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छत्तीसगढ़ में गैरकानूनी रेंज बना उड़ाये करोड़ों

छत्तीसगढ़ में गैरकानूनी रेंज बना उड़ाये करोड़ों

रायपुर. 19 अप्रैल 2012

छत्तीसगढ़ वन विभाग


छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभ्यारण्य के वन ग्रामों को विस्थापित करने के नाम पर एक बड़ा घोटाला सामने आया है. वन अधिकारियों ने नियम-कायदे को ताक पर रख कर एक खास रेंज में करोड़ों रुपये खर्च होना दिखा दिया है, जबकि वह रेंज कानूनन अस्तित्व में ही नहीं है. अकेले मार्च में ही 15 दिनों के भीतर विस्थापन के नाम पर 5 करोड़ रुपये खर्च कर डाले गये हैं. इससे पहले भी उस रेंज में कैंपा के मद से लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च किये जाने की खबर है. अब जबकि यह मामला सामने आया है तो वन अधिकारी इस मामले में एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं और मामले को किसी भी तरह निपटाने की तैयारी चल रही है.

मामला बारनवापारा के तीन वनग्रामों रामपुर, लाटादादर और नवापारा के विस्थापन से जुड़ा हुआ है. इन वनग्रामों के विस्थापन के लिये राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रामप्रकाश द्वारा 23 जुलाई 2010 को कोठारी रेंज के गठन का आदेश जारी किया गया. श्री रामप्रकाश द्वारा जारी आदेश क्रमांक व.प्रा/स्था/10/95 के द्वारा बारनवापारा अभ्यारण्य के तुरतुरिया, फुरफुंदी, लाटादादर, तालदादर और कोठारी उपक्षेत्रों को मिलाकर 123.48 वर्ग किलोमीटर के कोठारी रेंज का गठन किया गया.

कोठारी रेंज के गठन का आदेश जारी होने के साथ ही इस पर विवाद शुरु हो गया कि आखिर राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को नया रेंज गठित करने का अधिकार कैसे है. किसी रेंज के गठन का काम प्रधान मुख्य वन संरक्षक (प्रशासनिक) के जिम्मे होता है. इस पर तर्क दिया गया कि छत्तीसगढ़ फॉरेस्ट मेनूअल के अपेंडिक्स के अनुक्रमांक-29 में यह प्रशासनिक अधिकार प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को भी है. लेकिन जब कानूनी पहलू खंगाले जाने लगे तो इस मामले को ठंढ़े बस्ते में डाल दिया गया.

दिलचस्प ये है कि विवादों के बाद भी 3 दिन के भीतर वन संरक्षक (वन्यप्राणी) ने कोठारी रेंज में रेंजर की पदस्थापना के लिये राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रामप्रकाश को पत्र क्रमांक 578 के द्वारा रेंजर की पदस्थापना के लिये अनुरोध करते हुये पत्र जारी किया गया. सप्ताह भर के भीतर 2 अगस्त 2010 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रामप्रकाश ने पत्र क्रमांक व.प्रा./स्था/10/1988 द्वारा तुरंत ही रेंजर की पदस्थापना के लिये अपनी सहमति दी. ठीक अगले ही दिन वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रायपुर द्वारा 3 अगस्त 2010 को पत्र क्रमांक 617 के द्वारा वन संरक्षक कार्यालय में ही पदस्थ उदय सिंह ठाकुर को बतौर रेंजर संलग्न कर दिया गया. यह गौरतलब है कि कोठारी रेंज में उनकी नियुक्ति नहीं की गई, बल्की उन्हें अटैच किया गया. 3 अगस्त को ही वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रायपुर ने पत्र क्रमांक 615 द्वारा उदय सिंह ठाकुर को उनके अटैच किये जाने की सूचना दी और उसी दिन उदय सिंह ठाकुर ने कोठारी रेंज का प्रभार भी ग्रहण कर लिया.

3 अगस्त 2010 से ही कोठारी रेंज के रेंजर उदय सिंह ठाकुर ने अपना काम भी संभाल लिया और गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया भी शुरु कर दी गई. यह भी गौरतलब है कि रेंजर उदय सिंह ठाकुर का वेतन आज भी वन संरक्षक (वन्यप्राणी) कार्यालय से ही आहरित होता है. रामपुर, लाटादादर और नवापारा गांव के विस्थापन के लिये अब तक लगभग 25 करोड़ रुपये खर्च कर दिये गये हैं. लेकिन मार्च के महीने में जब लगभग 15 दिनों के भीतर की 5 करोड़ रुपये खर्च करने की बात सामने आई तो वन विभाग के कुछ अफसरों ने इस पर अचरज जताया. अफसरों का कहना था कि आखिर 15 दिन में ऐसा क्या काम कराया गया, जिसमें 5 करोड़ रुपये खर्च कर दिये गये. यह सब कुछ तब हुआ जब बारनवापारा में वन प्रबंधन और वन्यप्राणियों के नाम पर पूरे साल भर में बमुश्किल 20 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया था.

इसके बाद यह राज सामने आया कि जिस रेंज का गठन करके उसमें बजाप्ता रेंजर की स्थापना करके करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये, उस रेंज के लिये आज दिनांक तक कोई अधिसूचना जारी ही नहीं की गई है. जाहिर है, सरकारी राजपत्र में भी इस रेंज के गठन की कोई अधिसूचना तीसरे साल भी प्रकाशित नहीं हुई है. अब जब यह मामला वन अधिकारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है, वन विभाग किसी भी तरह इस मामले को सुलझाने की कवायद में जुटा हुआ है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

जयनारायण बस्तरिया [jaybastriya@gmail.com] दंतेवाडा - 2012-04-27 15:39:51

 
  बहुत बेहतरीन खोजी समाचार| हम प्रयावरण के लिए लडने वालो को संबल मिलता है की मिडिया ने जंगल में \'जंगल राज\' को सामने लाने की कोशिश की | फालोअप की इंतजार|  
   
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