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सच जीतेगा शायद

सच जीतेगा शायद

नई दिल्ली. 6 मई 2012 वर्तिका नंदा

आमिर खान


आमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए. बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की. मुबारक आमिर, मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार.

नई बात नहीं है भ्रूण हत्या... नई बात है - जज्बात के साथ उस पर बात जिसमें आमिर खरे उतरे. एक कमर्शियल कार्यक्रम होने, आमिर को प्रति एपिसोड 4 करोड़ दिए जाने की बात को परे कर दें तो सत्यमेव जयते सच के जीतने की एक उम्मीद को पैदा करता है और दुष्यंत के उस शेर को सार्थक भी - एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों..

पर एक बात की कमी खल गई. अपराधी कहीं नहीं दिखा और न ही उनका परिवार. जिस अपराधी की वजह से हत्याएं हुईं, उन तीन औरतों की जिंदगी जख्मों से भर गई, वे भी खिसियाते हुए दिखते तो सामाजिक न्याय पूरा होता. और नहीं तो कम से कम उन अपराधियों और उनके परिवारों को तस्वीरें तो दिखाई जातीं. कम से कम किसी तरह का सामाजिक बहिष्कार तो होता. कहीं ऐसा न हो कि अब पी़ड़ा से गुजरी औरतें तो याद रह जाएं लेकिन अपराधी फिर बीएमडब्यू में ही सैर करता दिखाई दे.

टीवी आडिया-विजुअल माध्यम है. यहां शोर बिकता है लेकिन साथ ही भावनाएं और संवेदनाएं भी. संवेदना से पूरी तरह भीगी यह तीन औरतें भी जब सत्यमेव जयते में बोलती हैं तो वे तमाम आंखें नम हो जाती हैं जो या तो कभी अपराध से गुजरी हैं या फिर किसी शुद्द मानसिक पृष्टभूमि से हैं. अपराधी ऐसे कार्यक्रम वैसे भी नहीं देखता. वो रिमोट से चैनल बदल देता है. उसकी दिलचस्पी पीड़ित में नहीं होती. अपराधी अपराध को करने के बाद बहुत जल्दी सब भूल जाता है –अपराध को भी और पीड़ित को भी. अपराधी की व्यस्तताएं बढ़ी होती हैं और उसका सामाजिक दायरा भी.

तो इसका मतलब क्या यह हुआ कि ऐसे कार्यक्रम पीड़ित से शुरू होकर पीड़ित पर ही खत्म हो जाए. क्या उन तमाम लोगों की कोई जवाबदेही नहीं जिन्होनें अपराध भोगती इन महिलाओं का साथ देने से इंकार किया होगा - चाहे वह पुलिस हो या ससुराल. अपराध से गुजरने की अंधेरी सुरंग बहुत लंबी होती है और बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो यह जान लेते हैं कि कौन उनके आस-पास ऐसा है जो अपराध का शिकार हो रहा है पर हम कहते कुछ नहीं.

धन्यवाद आमिर कि आपने पेड़ों के आस-पास नाचने के बजाय कुछ लोगों को तारे जमीन पर ही दिखा देने की कोशिश की. ऐसे काम तो दूरदर्शन को करने चाहिए थे. खैर. बस, कहना यही है कि यात्रा तभी मुकम्मल होगी जब अपराधी भी शर्मसार होगा. आप शायद जानते होंगे कि इन औरतों को आपके कैमरे के सामने आने से पहले अपने अंदर की दुनिया में बहुत संघर्ष करना पड़ा होगा. वे रातों में डरी होंगी और दोपहरों में अकेली चली होंगीं. उनकी हिम्मत को और हिम्मत दीजिए और उन चेहरों को जरूर सामने लाइए जो इनके दुख और अपमान की वजह बने. और इस सोते हुए समाज को बार-बार याद दिलाइए कि अपराधी का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए, हर हाल में.

समाज पुलिस या प्रशासन से यह उम्मीद नहीं लगा सकता. वहां के पेचीदा गलियारे और थकी हुई व्यवस्थाएं पीड़ित को थकाती हैं और अपराधी को तब तक इत्मीनान देती हैं जब कि बाद हद से गुजर न जाए. हां, मीडिया से उम्मीद जरूर की जा सकती है. उदय शंकर और आमिर - इस उम्मीद को सार्थक करेंगें न.


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