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आदिवासियों की नसबंदी से हटेगा प्रतिबंध

आदिवासियों की नसबंदी से हटेगा प्रतिबंध

रायपुर. 14 मई 2012 छत्तीसगढ़

आदिवासी


छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र (एसएचआरसी) ने प्रदेश की पांच विशेष पिछड़ी जनजातियों की नसबंदी पर लगी रोक को हटाने के लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा है. यह प्रस्ताव पिछले दिनों आयोजित आदिवासी सम्मेलनों से उठी मांग पर आधारित है.

एसएचआरसी के उपसंचालक डॉ. जे पी मिश्रा ने बताया कि बीते तीन महीनों में राज्य के तीन आदिवासी इलाकों में आदिवासी सम्मेलनों का आयोजन किया गया था. गरियाबंद, कोरबा और कवर्धा में आयोजित इन सम्मेलनों में आदिवासियों की जो सबसे बड़ी समस्या बन कर उभरी है, वह परिवार नियोजन से संबंधित है.

उन्होंने बताया कि पिछड़ी जनजाति के लोग खुद की नसबंदी पर लगी रोक से काफी परेशान और नाराज भी हैं. इस रोक को हटाए जाने की मांग के पीछे समुदाय के पास कई तर्क हैं. सबसे पहला तर्क यह है कि एक इंसान होने के नाते यह उनका व्यक्तिगत अधिकार होना चाहिए कि वे खुद के लिए यह तय कर सकें कि उन्हें कितने बच्चे चाहिए. फिर मसला यह भी है कि नसबंदी पर लगी रोक के चलते उनका परिवार काफी वृहद हो जाता है. सबके पालन-पोषण के पीछे जो खर्च आता है, उसे परिवार वहन करने में असमर्थ होता है. ऐसे में बच्चों को कुपोषण और दूसरी बीमारियों का शिकार होना पड़ता है. उनकी शिक्षा पर भी परिवार का मुखिया कोई खास ध्यान नहीं दे पाता.

उल्लेखनीय है कि आजादी के कुछ सालों बाद ऐसी स्थिति बनी कि देश की कुछ विशेष पिछड़ी जनजातियां विलुप्ति की कगार पर खड़ी थीं. प्रदेश में ऐसी कुल पांच पिछड़ी जनजातियां हैं. इनमें बैगा जनजाति कवर्धा और बिलासपुर जिलों में, कमार गरियाबंद जिले में, पहाड़ी कोरवा कोरबा जिले में निवास करती है. जिन्हें बचाने के लिए केंद्र सरकार ने उनकी नसबंदी पर रोक लगा रखी है. केंद्र सरकार की इस रोक का नतीजा यह हुआ कि इन जनजातियों के एक-एक परिवार में बच्चों की संख्या दर्जन भर से अधिक तक पहुंच गई. लंबे-चौड़े परिवार को चलाने के लिए आय भी अच्छी खासी चाहिए. लेकिन इन जनजातियों की आर्थिक स्थिति काफी खराब है. वे बड़े परिवार का खर्च उठा सकने में असमर्थ हैं. नतीजतन इन्हें आर्थिक तंगी के साथ कुपोषण और दूसरी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.


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