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ममता जी मैं माओवादी नहीं हूं

ममता जी मैं माओवादी नहीं हूं

नई दिल्ली. 21 मई 2012

तानिया भारद्वाज


ममता बनर्जी से सवाल पूछे जाने पर माओवादी करार दे दी गई प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की छात्रा तानिया भारद्वाज ने ममता बनर्जी को एक खुला खत लिख कर कई सवाल पूछे हैं. रविवार से ही कोलकाता की मीडिया में तानिया का यह पत्र छाया हुआ है. अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ में छपा यह पत्र सोमवार को बांग्ला और दूसरी भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में भी चर्चा का विषय बना रहा.

तानिया भारद्वाज ने अपने पत्र में ममता बनर्जी को लिखा है कि “कोलकाता में आपने, बंगाल के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने सीएनएन-आईबीएन के सवाल-जवाब कार्यक्रम में टाउन हॉल में मुझे माओवादी करार दे दिया. मैंने आखिर ऐसा क्या किया था कि मुझे ये तमगा मिला? मैंने आपसे सिर्फ एक सवाल पूछा था.”

टेलीग्राफ में ही लिखे गये अपने एक पुराने पत्र का हवाला देते हुये तानिया ने लिखा है कि “मैंने उस समय लिखा था- हम परिवर्तन चाहते हैं मगर डरे हुए हैं कि हम एक तवे की बजाए चूल्हे पर जा बैठेंगे. मुझे आशंकित कह सकते हैं मगर मैं किसी भी राजनीतिक दल को बंगाल के लिए एक सकारात्मक विकल्प के तौर पर नहीं देखती. ये दुखद है मगर एक साल बाद राष्ट्रीय टेलीविजन पर ये साबित हो गया कि वह कितना सही थीं.”

तानिया ने अपने पत्र में लिखा है- "मैंने आपसे सिर्फ यही पूछा था कि आपकी पार्टी के मदन मित्रा जैसे प्रभावशाली मंत्री और अरबुल इस्लाम जैसे सांसदों को क्या ज्यादा जिम्मेदारी से बर्ताव नहीं करना चाहिए. कई अन्य लोगों की तरह मैं भी उस बात से असहज हुई थी जब मदन मित्रा ने पुलिस की जाँच पूरी होने से पहले ही एक बलात्कार पीड़िता के मामले पर अपना फैसला सुना दिया था. मैंने आपसे वही पूछा जो मेरे इर्द-गिर्द बैठे ज्यादातर लोग पूछना चाहते थे, वे लोग जिन्होंने परिवर्तन के लिए मतदान किया था. क्या हम अपने नेताओं से यही अपेक्षा रखते हैं. वे लोग जो उदाहरण पेश करते हैं और बाकी लोग उनके पीछे चलते हैं. मैं आपसे सिर्फ यही जानना चाहती थी.”

ममता बनर्जी द्वारा उसी कार्यक्रम में लोकतंत्र की दुहाई देने पर निशाना साधते हुये तानिया ने लिखा है कि- “एक सच्चे लोकतंत्र का एक सबसे अहम पहलू, जैसा मैंने राजनीति शास्त्र के छात्र के तौर पर समझा है, क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होता है. इस स्वतंत्रता का मतलब ये है कि व्यक्ति अपनी राय व्यक्त कर सके, सवाल पूछ सके, उसे अधिकारियों के डर में अपनी बात दबे-छिपे रूप में न कहनी पड़े और अहम लोगों के कार्टून पर वह कुछ चुटकी ले सके. लेकिन ये दुखद है कि राज्य में लोकतांत्रिक मशीनरी में काफी विफलता दिखती है और जैसा कि महज आपके कह भर देने से मैं माओवादी नहीं बन जाऊंगी वैसे ही राज्य में भी लोकतंत्र तब तक कायम नहीं होगा, जब तक वह हर क्षेत्र में वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हो जाता…”

तानिया ने दुख और पीड़ा के साथ अपने पत्र के अंत में लिखा है कि- “आपने कई बार बुद्धिजीवियों के बंगाल छोड़कर जाने का जिक्र किया है. मेरे पास यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और स्कूल ऑफ ओरियंटल ऐंड अफ्रीकन स्टडीज में विकास और प्रशासन की आगे की पढ़ाई से जुड़े प्रस्ताव आए हैं. शायद अब मैं भी चली जाउँगी और अब आपको वजह पता होगी कि ऐसा क्यों हुआ.”

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

NIKHIL KUMAR JHA [nikhil.jha249@gmail.com] BILASPUR (C.G.) - 2012-05-21 09:54:21

 
  ममता जी, यकीनन तनिय़ा जी नहीं आप माओवादी हैं क्योंकि मैं भारत के सबसे नक्सलप्रभावित राज्य में रहता हूं और मुझे पता है कि जैसी प्रतिक्रिया इन दिनों आपकी होती जा रही है, ये कोई जनवादी नेता की न हो कर माओवादी तानाशाह ही दे सकता है. 
   
 

Ranjeet Thakur [] Jagdalpur Chhattisgarh - 2012-05-21 06:14:19

 
  तानिया बिल्कुल सही है. राजनीतिक दलों में सब जगह गंदगी है. इस हालत को हम बदल सकते हैं लेकिन हर व्यक्ति को तानिया जैसे बहादूर और जागरूक होना होगा. 
   
 

rajjan [] muzaffarpur,bihar - 2012-05-21 06:08:11

 
  राजनेता देश के लिए हैं या देश इन राजनेताओं के लिए चारागाह है? इनकी इसी तानाशाही प्रवृत्ति के कारण नक्सलवाद की समस्या उत्पन्न हुई है.  
   
 

sant [santmahto@gmail.com] bilaspur - 2012-05-21 05:16:50

 
  तानिया अपनी जगह सही है. राजनीतिक दलों में सब जगह गंदगी है. इसी हालत को बदलने की जरुरत है. 
   
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