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एशियन गेम्स में मेडल लाने वाली कर रही मजदूरी

एशियन गेम्स में मेडल लाने वाली कर रही मजदूरी

बेंगलुरु. 24 जुलाई 2012

शांति सुंदराजन


2006 में दोहा में हुये एशियन गेम्स में भारत के लिये रजत पदक हासिल करने वाली ऐथलीट शांति सुंदराजन को सरकार ने भुला दिया और आज शांति एक ईंट भट्टे में मजदूरी करने के लिये मजबूर है. अरबों रुपये खेल के नाम पर खर्च करने वाले कलमाड़ियों और खेल मंत्रालय के चर्बीदार अफसरों ने कभी शांति की सुध नहीं ली. शांति की खबर सामने आने के बाद खेल मंत्रालय ने कहा है कि वह मामले की जांच करवाएगा.

गौरतलब है कि 2006 के दोहा एशियन गेम्स में 800 मीटर रेस में सिल्वर मेडल जीतने के बाद जेंडर टेस्ट में फेल रही भारतीय ऎथलीट शांति सुंदराजन देश लौटने के बाद ही हाशिये पर डाल दी गई. उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार के पास कई बार गुहार लगाई लेकिन उन्हें चपरासी की नौकरी भी नहीं मिली. उनकी ही तरह 2009 में बर्लिन विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली दक्षिण अफ्रीकी ऎथलीट कास्टर सीमेन्या भी जेंडर टेस्ट में फेल रही थी लेकिन वह लंदन ओलिंपिक में अपने देश का झंडा थाम कर अपनी टीम की अगुआई करेंगी. उनके लिये उनके देश ने आवाज उठायी और उनके जेंडर टेस्ट को खारिज कर दिया.

इसके उलट शांति को भारतीय खेल मंत्रालय ने न तो टीम में शामिल किया और ना ही उनकी खबर ली. यहां तक कि उन पर भारत के ऐथलेटिक्स फेडरेशन ने प्रतिबंध भी लगा दिया. दो जून की रोटी के लिये मजबूर शांति को अंततः ईंट भट्टे पर मजदूरी करनी पड़ी. शांति पिछले 3 महीने से ईंट भट्टे में काम करके ही अपना पेट पाल रही हैं.

शांति के अनुसार तमिलनाडु में वह सरकार के कोचिंग सेंटर में 5 हजार रुपये की तनख्वाह पर बच्चों को कोचिंग देने का काम करती थी. उसकी कोचिंग पाने वाले बच्चों ने कई पदक जीते. लेकिन सरकार के साथ उनका अनुबंध खत्म होने के बाद उनके सामने भूखों मरने की नौबत आ गई. जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने ईंट भट्टे में मज़दूरी कर ली.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

abdul mulla [QA.83@rediffmail.com] pune - 2012-07-24 07:49:34

 
  जो लोग इनको अनदेखा कर रहे हैं उन्हें तो सस्पेंड करना चाहिए.  
   
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