अन्ना राजनीति को नहीं बदल पाएंगे
अन्ना राजनीति को नहीं बदल पाएंगे
नई दिल्ली. 3 अगस्त 2012
चुनाव विश्लेषक और समाजशास्त्री योगेंद्र यादव का कहना है कि अन्ना हजारे और उनकी
टीम भारत की राजनीतिक व्यवस्था को बदल पायेंगे, इसमें संशय है. योगेंद्र यादव का
कहना है कि ये बहुत कठिन काम है. भारत जैसे विशाल देश की राजनीतिक व्यवस्था को
बदलना आसान काम नहीं है. कोशिशें ज़रूर हुई हैं और लोग असमर्थ रहे हैं.
बीबीसी के लिखे एक लेख में योगेंद्र यादव ने कहा है कि जिस आंदोलन को घोर राजनीति
विरोधी कहा गया और जिसे बाद में काँग्रेस विरोधी और बीजेपी समर्थक माना गया, वो
आंदोलन इन दोनों धाराओं से मुक्त हो चुका है या वो दब चुकी हैं. आंदोलन की मुख्य
धारा अब मौजूदा राजनीति को अंगीकार करने और उसके जरिए परिवर्तन करने का प्रयास
करेगी.
योगेंद्र यादव का कहना है कि अन्ना अपने वक्तव्यों में, प्रशांत भूषण अपने लेखन में
और अरविंद केजरीवाल अपनी किताब में जो बातें कहते रहे हैं वो सब मिलकर एक राजनीतिक
व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करते हैं. पर सवाल ये है कि क्या ये लोग उसे हासिल करने
में सफल होंगे? ये बहुत कठिन काम है. भारत जैसे विशाल देश की राजनीतिक व्यवस्था को
बदलना आसान काम नहीं है. कोशिशें ज़रूर हुई हैं और लोग असमर्थ रहे हैं. ये कुछ ऐसा
ही है कि पिछले डेढ़ सौ सालों में पूँजीवाद को बदलने की कोशिशें हुई हैं पर
पूँजीवाद नहीं बदला. इसका मतलब ये नहीं कि बदलाव की कोशिशें ही व्यर्थ हैं या उनसे
कोई बदलाव नहीं हुआ है.
अपने लेख में योगेंद्र यादव का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि अनशन के हथियार को
बार-बार इस्तेमाल करने से उसकी धार कुंद पड़ती है. लेकिन इस आंदोलन का मुख्य आधार
रामलीला मैदान या किसी भी मैदान की जनसंख्या नहीं थी. इसका मुख्य आधार उन लोगों का
नैतिक बल था जो न रामलीला मैदान में आए और न ही अपने शहर के किसी प्रदर्शन में
शामिल हुए लेकिन जो मन ही मन महसूस करते हैं कि कुछ बुरा हो रहा है और ये लोग उस
बुरे की काट देने वाले हैं. आम लोगों में जब तक ये भाव बना हुआ है तब तक इस आंदोलन
में ताकत बची रहेगी. और मेरे खयाल से ये भाव अभी खत्म नहीं हुआ है.
अन्ना हजारे के निर्णय को लेकर संशय जताते हुये योगेंद्र यादव ने कहा है कि टीम
अन्ना से पहले भी समाज परिवर्तनकारी ताकतें सामने आई हैं पर संसदीय रास्ते पर आते
ही उनके सपने धूमिल पड़ गए. भारत और पड़ोस में वामपंथी-कम्युनिस्ट आंदोलन बहुत बड़े
और गहरे आंदोलन रहे. वो भी संसदीय राजनीति की फिसलन से नहीं बच पाए तो इस जैसे नए
आंदोलन के लिए तो चुनौती और बड़ी होगी.