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सबसे नाकाम पीएम हैं मनमोहन

सबसे नाकाम पीएम हैं मनमोहन

नई दिल्ली. 5 सितंबर 2012

मनमोहन सिंह


टाइम पत्रिका द्वारा 'अंडरएचीवर' घोषित भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर इस बार वॉशिंगटन पोस्ट ने हमला करते हुये उन्हें नकारा प्रधानमंत्री कहा है. वॉशिंगटन पोस्ट के दिल्ली संवाददाता साइमन डेनयर ने अपनी रिपोर्ट में मनमोहन सिंह को अब तक के इतिहास का सर्वाधिक नाकाम प्रधानमंत्री होने की आशंका जताई है. वाशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक हलकों में गरमाहट है.

इधर सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा है कि हमारे प्रधानमंत्री के बारे में किसी विदेशी अखबार में छपी बेबुनियाद खबर को लेकर हमारी अपनी चिंताएं हैं. कैसे कोई अमरीकी अखबार इस मामले को इतने हल्के में ले सकता है और किसी अन्य देश के प्रधानमंत्री के बारे में कुछ भी छाप सकता है. मैं विदेश मंत्रालय और सरकारी अधिकारियों से बात करूंगी और निश्चित तौर पर इस मुद्दे पर कदम उठाया जाएगा.

साइमन डेनयर ने वाशिंगटन पोस्ट में लिखा है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने देश को आधुनिकता, समृद्धि और शक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ने में मदद की, लेकिन शर्मीले, मृदुभाषी 79 वर्षीय मनमोहन सिंह पर अब इतिहास में एक नाकाम प्रधानमंत्री के तौर पर दर्ज होने का खतरा मंडरा रहा है. भारत के आर्थिक सुधारों के निर्माता कहे जाने वाले मनमोहन सिंह को अमरीका और भारत के बीच रिश्ते बेहतर होने का खास तौर से श्रेय दिया जाता है और विश्व मंच पर उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सहयोगी हमेशा मनमोहन के साथ शानदार संबंधों और दोस्ती की मिसाल देते रहे हैं.

वाशिंगटन पोस्ट का कहना है कि बेहद सम्मानित, विनम्र और बुद्धिमान टेक्नोक्रैट होने की मनमोहन सिंह की छवि से अब एक बिल्कुल ही अलग छवि उभर रही है. ये छवि है एक ऐसे प्रभावहीन नौकरशाह की जो भ्रष्टाचार से डूबी सरकार का नेतृत्व कर रहा है. पिछले दो हफ्तों से हर दिन भारतीय संसद हंगामे और शोरशराबे के बीच स्थगित होती रही है. विपक्ष कोयला आवंटन में कथित घोटाले पर प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग रहा है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बतौर प्रधानमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल में उनकी छवि में नाटकीय रूप से गिरावट आई है और धीरे धीरे उनकी प्रतिष्ठा भी तार तार हो रही है. सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में भी गिरावट दर्ज की जा रही है. इस सबके चलते विश्व शक्ति बनने की भारत की संभावनाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं. ये विडंबना ही है कि ईमानदार छवि और आर्थिक अनुभव जैसी जो चीजें कभी मनमोहन सिंह की खूबियां हुआ करती थीं, अब वही उनकी सरकार की नाकामियों का आइना बन गई हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल प्रभावशाली रहा. 2008 में अमरीका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर उन्होंने न सिर्फ गठबंधन सहयोगियों बल्कि अपने पार्टी के भीतर उठे विरोध का भी मजबूती से सामना किया. ये एक बड़ा समझौता था जिससे अंतराष्ट्रीय समुदाय में भारत का अलगाव दूर हुआ. दरअसल 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षणों के कारण भारत परमाणु क्षेत्र में अलग थलग पड़ा था.


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