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वाशिंगटन पोस्ट ने यह लिखा मनमोहन पर

वाशिंगटन पोस्ट ने यह लिखा मनमोहन पर

वॉशिंगटन. 6 सितंबर 2012

मनमोहन सिंह


द वाशिंगटन पोस्ट में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में जो टिप्पणी लिखी गई है, वह भले ही सत्ताधारी दल को रास नहीं आ रहा हो लेकिन वाशिंटगन पोस्ट ने इस लेख पर माफी से इंकार कर दिया है. अखबार ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर जो टिप्पणी लिखी है, वह इस प्रकार है-

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने मुल्क को समृद्धि, ताकत और आधुनिकता के रास्ते पर भले ही ले गए हों, लेकिन उनके आलोचकों के मुताबिक, 79 साल के शर्मीले, मृदुभाषी मनमोहन सिंह पर इतिहास में नाकामयाब व्यक्ति के रूप में याद किए जाने का खतरा मंडरा रहा है.

भारत में आर्थिक उदारीकरण के पुरोधा मनमोहन सिंह का अमरीका से फिर से सम्बंध स्थापित करने में बड़ा योगदान रहा है और वैश्विक मंच पर आज वे एक सम्मानित व्यक्तित्व हैं. खुद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सहयोगी भी ओबामा-मनमोहन की घनिष्ठता और दोस्ती की मिसाल देते रहे हैं, लेकिन बेहद ईमानदार, विनम्र और बुद्धिजीवी टैक्नोक्रेट की छवि इस दौर में धीरे-धीरे एक अलग शक्ल अख्तियार कर चुकी है.

अब वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार की कमान सम्भालने वाले एक अक्षम नौकरशाह के रूप में देखे जाने लगे हैं. भारतीय संसद पिछले दो सप्ताह से हर दिन स्थगित हो रही है. विपक्ष कतारबद्ध होकर कोयला खदान आवंटन में हुए भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उनका इस्तीफा मांगने पर अड़ा हुआ है. बतौर प्रधानमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह की छवि में, नाटकीय ढंग, तेजी से गिरावट आई है. लगातार कमजोर होती प्रतिष्ठा और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के मद्देनजर देश की अर्थव्यवस्था में भी सुस्ती आई है. यही वजह है कि भारत के विश्व शक्ति बनने की राह में रोड़े दिखाई देने लगे हैं.

जाने-माने राजनीतिक इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक, मनमोहन सिंह भारतीय इतिहास में एक "ट्रैजिक फिगर" (त्रासद छवि) बन गए हैं. विडम्बना यह है कि उनकी ताकत, ईमानदारी और आर्थिक अनुभव ही सरकार की बड़ी नाकामी का आईना बन गई है. सिंह के मौजूदा कार्यकाल में सुधार रूक गए हैं, आर्थिक विकास की दर तेजी से कम हुई है और रूपये की साख भी धराशायी हो गई. उनकी छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला आरोप यह है कि उनकी कैबिनेट के साथी जमकर अपनी जेबें भरने में लगे रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री अपनी नजरें फेरकर चुप रहे.

उनकी इस चुप्पी पर इस दौर में चुटकुले भी गढ़े जाने लगे हैं. मसलन, किसी मीटिंग या कॉन्फ्रेंस के दौरान मौजूद लोगों से कहा जाने लगा कि वे अपने मोबाइल फोन को "मनमोहन सिंह मोड" पर कर लें. एक दूसरे चुटकुले में एक डेंटिस्ट इलाज के लिए सीट पर बैठे मनमोहन सिंह से गुजारिश करता है कि कम से कम यहां (क्लीनिक) तो मुंह खोलिए.

खैर, लम्बी चुप्पी के बाद आखिरकार मनमोहन सिंह ने पिछले सप्ताह अपना मुंह खोला. गौरतलब है, कोयला खदान आवंटन में सरकारी खजाने को हुए अरबों रूपये के नुकसान को सामने लाती कैग की रिपोर्ट के बाद चारों ओर से हो रही आलोचनाओं का जवाब देना जरूरी था. मनमोहन सिंह ने संसद में शायराना अंदाज में भाषण शुरू किया, कहा, "हजारों सवालों से अच्छी मेरी खामोशी है, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी है." साथ ही कहा आमतौर पर यह मेरी आदत रही है कि मैं स्वयं पर होने वाली सोची-समझी आलोचनाओं का जवाब नहीं देता. उन्होंने कहा कि खदान आवंटन में कोई गलत प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है. यह कहते ही संसद में बवाल मच गया. उन्हें अपनी बात संसद के बाहर मीडिया के समक्ष रखनी पड़ी.

बहरहाल, संसद के भीतर मौजूदा हालत देखकर तो यही लगता है कि उनके इस्तीफे की मांग उठती रहेगी, लेकिन इस घोटाले के आरोपों ने उनकी छवि को तार-तार कर दिया है. यह कार्यकाल उन्हें लगातार सवालों के घेरे में खड़े करता रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपने पहले कार्यकाल में वे एक मजबूत प्रधानमंत्री के तौर पर उभरे थे.

वर्ष 2008 में अमरीका से परमाणु करार करना इसका बड़ा उदाहरण है, जब संप्रग सरकार में सहयोगी वाम दल और विपक्ष के कड़े प्रतिरोध के बावजूद वे इसमें सफल रहे. यह एक बड़ा समझौता था, जिससे 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद परमाणुविक दुनिया से कायम रहा अलगाव खत्म हुआ. 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस नीत गठबंधन की जीत हुई. काफी लोगों ने इस जीत का सेहरा मनमोहन सिंह के सिर बांधा. लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर ही इस जीत का श्रेय उनको नहीं दिया गया.

कुछ सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ने कभी नहीं स्वीकारा कि 2009 की जीत की वजह मनमोहन सिंह थे. कुछ लोगों के अनुसार, उन्हें पार्टी ने कमजोर माना, जिससे उनके मन में निराशा घर कर गई. महज राहुल गांधी के परिपक्व होने तक ही उनके प्रधानमंत्री पद पर रहने की बातें सामने आई. जल्द ही पार्टी के बाहर-भीतर उनकी खुलकर आलोचना होने लगी. 2009 मुंबई हमलों के बावजूद पाकिस्तान से शांति वार्ता को लेकर उन पर सवाल उठाए गए. वे कैबिनेट बैठक के दौरान और ज्यादा चुप रहने लगे. उनके करीबी मानते हैं कि उनकी प्रतिभा पर कोई शक नहीं है, पर राजनीतिक व्यावहारिकता को लेकर वे संदेह में रहते हैं. रामचंद्र गुहा कहते हैं, मनमोहन इतिहास में ऎसे व्यक्ति के रूप में जाने जाएंगे, जिसे यह पता ही नहीं था कि उसे सेवानिवृत्त कब होना है.

बेशक, अब वे ऊर्जाहीन और थके हुए व्यक्ति हैं. उम्र के इस पड़ाव पर दोबारा से ऊर्जावान होने की बात बेमानी है. फिलहाल चीजें उनके नियंत्रण से बाहर हैं और उनकी पार्टी व सरकार के लिए आगे भी स्थितियां और खराब हो सकती है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ajit purohit [rajubhaiya62@gmail.com] jabalpur - 2012-09-06 06:03:49

 
  सवाल यह नहीं है कि-वे इमानदार हैं यह नहीं,सवाल यह है कि-CAG जैसी संस्था पर शक कर उनके मंत्रीमंडक एवं पार्टी के सदस्य क्या सही कर रहें हैं, इस प्रश्न को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, अत: यह प्रश्न स्वत: गम्भीर हो जाता है कि-इन सभी मुद्दों पर हमारे प्रधानमन्त्री जी मौन क्यों हो जाते हैं......  
   
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