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खुदरा व्यापार में एफडीआई को हरी झंडी

खुदरा व्यापार में एफडीआई को हरी झंडी

नई दिल्ली. 14 सितंबर 2012

एफडीआई

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मनमोहन सिंह की सरकार ने देश में विदेशी निवेश में बढ़ावा देते हुए मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र 51 फीसदी विदेश निवेश को मंजूरी दे दी. वहीं एकल ब्रांड में सौ फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी गई. हालांकि केंद्र सरकार ने विदेशी कंपनियों को राज्यों में प्रवेश देने का फैसला राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है.

इसके अलावा सीसीईए की बैठक में देसी एयरलाइंस कंपनियों में 49 फीसद की एफडीआई को मंजूरी दे दी गई है. विनिवेश की गाड़ी को आगे बढ़ाते हुए मंत्रिमंडल ने चार सरकारी कंपनियों में विनिवेश को हरी झंडी दे दी है. एमएमटीसी और ऑयल इंडिया में दस फीसदी, हिंदुस्तान कॉपर में 9.59 फीसदी और नाल्को में 12.5 फीसदी विनिवेश हो सकेगा. साथ ही सरकार ने ब्रॉडकास्ट मीडिया क्षेत्र में एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 74 फीसदी कर दिया है.

भारत में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी देते रहे हैं. रविवार के स्तंभकार जे के कर के अनुसार भारत में वर्तमान खुदरा व्यवसाय 29.50 लाख करोड़ रुपयों का है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का करीब 33 प्रतिशत है. अब यदि यह हिस्सा विदेशी धन्ना सेठों के हाथ चला गया तो जितना पैसा मुनाफे के रुप में विदेश चला जाएगा, उससे देश में आयात-निर्यात का संतुलन बिगड़ना तय है. भारत में छोटे और मंझौले खुदरा दुकानों की संख्या 1 करोड़ 20 लाख के आसपास है. इन दुकानों में करीब 4 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है. ऐसे में सवाल पूछने का मन होता है कि अगर इन 4 करोड़ लोगों के बजाये 4 या 5 धन्ना कंपनियों को रोजगार दे दिया जाएगा तो क्या इससे देश का भला होगा ?

भारत में अगर एक बार इन महाकाय कंपनियों को खुदरा के क्षेत्र में प्रवेश दे दिया गया तो ये कंपनियां दिखा देंगी कि लूट पर टिकी हुई अमानवीय व्यापार की परिभाषा क्या होती है ! इन दुकानों के सस्ते माल और तरह-तरह के लुभावने स्कीम के कारण भारतीय दुकानों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ जाएगा. जब इन कंपनियों का एकाधिकार कायम हो जाएगा, उसके बाद ये अपने असली रुप को सामने लाएंगी.

वॉल मार्ट की दुकानों में 40 फीसदी सामान वॉल मार्ट कंपनी के ही ब्रांड होते हैं. यह किसानों तथा उत्पादकों से अपनी शर्त पर माल खरीदती है. एक बार एकाधिकार होने के बाद ये कंपनियां किसानों को मजबूर कर देंगी कि वे फलां-फलां कंपनियों के खाद व बीज खरीदें. बाज़ार में एकमात्र खरीदार होने के कारण वॉल मार्ट उत्पादकों तथा किसानों को अत्यंत कम कीमत पर अपने उत्पाद बेचने के लिये बाध्य कर देता है.


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