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ममता, मुलायम, मायावती और एम की माया

ममता, मुलायम, मायावती और एम की माया

नई दिल्ली. 19 सितंबर 2012 बीबीसी

ममता बनर्जी


तृणमूल कांग्रेस पार्टी नेता ममता बनर्जी की केंद्र सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा और द्रविड़ मुनेत्र कझगम के 20 सितंबर के भारत बंद में शामिल होने के ऐलान से केंद्र सरकार को उत्तर प्रदेश के नेताओं का आसरा रह गया है.

कांग्रेस, सरकार चलाने के लिए अँगरेज़ी के अक्षर 'एम' से शुरू होने वाले चार बड़े नेताओं के भरोसे रही है. बंगाल से ममता बनर्जी और तमिलनाडु से एम करुणानिधि की धमकियों से निबटने के लिए उत्तर प्रदेश से मुलायम सिंह यादव तथा मायावती ने सरकार की मदद की है.

मगर अब जबकि सरकार में शामिल रही तृणमूल कांग्रेस ने सरकार से अलग होने की घोषणा की है तो सरकार फिर इस गणित में लग गई है कि आड़े वक्त में काम आने के लिए वास्तव में उसके पास कितना संख्या बल है.

अब तक अपने दम पर लोकसभा में बहुमत के आँकड़े 272 के आस-पास मँडराने वाला यूपीए का संख्या बल अब बाहर से समर्थन दे रहे समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (सेक्युलर) पर निर्भर हो गया है.

तृणमूल कांग्रेस के समर्थन वापस ले लेने से फ़िलहाल यूपीए सरकार के पास 254 सांसदों का समर्थन है. इसमें सपा के 22, बसपा के 21, राजद के चार और जनता दल-एस के तीन सांसद जोड़ दिए जाएँ तो सरकार 300 का आँकड़ा पार कर जाती है. मगर सपा नेता रामगोपाल यादव ने ममता के समर्थन वापसी के ऐलान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "सरकार अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है और आँख मूँदकर हमारे समर्थन का भरोसा नहीं कर सकती. हमारा निर्णय स्वतंत्र होगा." सपा ने 20 सितंबर के भारत बंद के बाद इस बारे में अंतिम निर्णय लेने की घोषणा की है.

उधर मायावती भी कह चुकी हैं कि नौ अक्तूबर को लखनऊ में आयोजित होने जा रही पार्टी की रैली के बाद वह घोषणा करेंगी कि केंद्र सरकार को समर्थन पर उन्हें क्या कहना है. इधर केंद्र सरकार जब ममता बनर्जी के फ़ैसले पर नज़रें गड़ाए बैठी थी कि उसी बीच ख़बर आई कि 18 सासंदों वाले डीएमके ने भी 20 सितंबर के भारत बंद में शामिल होने की घोषणा कर दी है.

इन झटकों के बीच केंद्र सरकार को ये भरोसा है कि शायद ये पार्टियाँ इस समय मध्यावधि चुनाव न चाहें और उनका समर्थन बरक़रार रहे और दूसरा ये कि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के मज़बूत होने की आशंका के चलते भी शायद ये दल उनसे पूरी तरह रिश्ता नहीं तोड़ेंगे. साथ ही कांग्रेस प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने ममता बनर्जी के इस्तीफ़े पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूरी तरह आक्रामक रुख़ भी नहीं अपनाया. उधर ममता ने भी एक तरह से कांग्रेस को शुक्रवार शाम तक का समय दिया है, जिस समय उनके मंत्री प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को इस्तीफ़ा सौंपेंगे.

इस समय सरकार में तृणमूल कांग्रेस के छह मंत्री हैं. इनमें मुकुल रॉय कैबिनेट मंत्री हैं जिनके पास रेल मंत्रालय है. उनके अलावा सौगत रॉय, शिशिर अधिकारी, सुदीप बंधोपाध्याय, सीएम जटुआ और सुल्तान अहमद राज्य मंत्री हैं.

जनार्दन द्विवेदी का ये कहना कि 'हम तृणमूल कांग्रेस को एक अहम सहयोगी मानते हैं... ममता जी ने कुछ मुद्दे उठाएँ हैं... हम उन पर सरकार से बात करेंगे..', जताता है कि सरकार किसी समझौता फ़ॉर्मूले पर काम करने की कोशिश कर सकती है. मगर तृणमूल कांग्रेस ने भी काफ़ी कड़ा रुख़ ले रखा है. उसने रसोई गैस सिलिंडरों पर लगी सीमा हटाने, डीज़ल की बढ़ी क़ीमत वापस लेने और खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का फ़ैसला वापस लेने की माँग रख दी है.

अब ये सारी माँगें तो सरकार मानने को तैयार नहीं दिखती मगर विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इन फ़ैसलों से असहज हो रहे बाक़ी सहयोगियों और ख़ुद अपने कुछ सांसदों की नाराज़गी दूर करने के लिए सरकार कुछ रियायत दे सकती है. इसके तहत रसोई गैस के सिलिंडरों पर लगी सीमा छह से बढ़ाई जा सकती है. मुख्य विपक्षी गठबंधन एनडीए के नेता ममता बनर्जी के फ़ैसले पर खुलकर उनकी तारीफ़ कर रहे हैं मगर ममता ने एनडीए का रुख़ करने का कोई संकेत नहीं दिया है.

ममता की पार्टी के नेताओं ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि वे अब अकेले ही इस मुद्दे पर संघर्ष करेंगे. भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि वह स्थिति पर विचार करने के बाद तय करेगी कि सरकार के बहुमत साबित करने के लिए विशेष सत्र बुलाए जाने की माँग के साथ वे राष्ट्रपति के पास जाएँ या नहीं.

वैसे शिवसेना ने ममता बनर्जी को 'बंगाल की शेरनी' करार दे दिया है तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस फ़ैसले के लिए बनर्जी की तारीफ़ कर रहे हैं. मगर इस राजनीतिक उठापटक के बीच सरकार अब मुलायम सिंह यादव और मायावती की ओर नज़रें लगाए बैठी है.


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