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पैसा पेड़ पर नहीं लगता-मनमोहन

पैसा पेड़ पर नहीं लगता-मनमोहन

नई दिल्ली. 21 सितंबर 2012

मनमोहन सिंह


भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महंगाई के कारण बदहाल हो चुके देश के नागरिकों को संबोधित करते हुये साफ शब्दों में कहा कि पैसा पेड़ों पर तो लगता नहीं...यदि हम कड़े कदम न उठाते तो वित्तीय घाटा, सरकारी खर्चा खासा बढ़ जाता. निवेशकों का विश्वास भारत में कम हो जाता. वे कतराने लगते और ब्याज की दरें बढ़ जाती...बेरोजगारी भी बढ़ जाती. मनमोहन सिंह ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि बड़े कदम उठाने का समय आ गया है. मुझे आपके विश्वास की जरूरत है, आप उनके बहकावे में न आएँ जो आपको गलत जानकारी देते हैं.

तृणमूल कांग्रेस के यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हम अपनी ज़रूरत के तेल का करीब 80 प्रतिशत आयात करते हैं और पिछले चार सालों के दौरान विश्व बाजार में तेल की कीमतों में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है. हमने इन बढ़ी हुई कीमतों का सारा बोझ आप पर नहीं पड़ने दिया. हमारी कोशिश यह रही है कि जहां तक हो सके आपको इस परेशानी से बचाए रखें.

मनमोहन सिंह ने कहा कि इसके नतीजे में पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली सब्सिडी में बड़े पैमाने पर इज़ाफा हुआ है. पिछले साल यह सब्सिडी 1 लाख चालीस हजार करोड़ रुपए थी. अगर हमने कोई कार्रवाई न की होती तो इस साल यह सब्सिडी बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए से भी ज़्यादा हो जाती. इसके लिए पैसा कहां से आता? पैसा पेड़ों पर तो लगता नहीं है. अगर हमने कोई कार्रवाई नहीं की होती तो वित्तीय घाटा कहीं ज्यादा बढ़ जाता. यानि कि सरकारी आमदनी के मुकाबले खर्च बर्दाश्त की हद से ज़्यादा बढ़ जाता. अगर इसको रोका नहीं जाता तो रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों की कीमतें और तेजी से बढ़ने लगतीं. निवेशकों का विश्वास भारत में कम हो जाता. निवेशक, चाहे वह घरेलू हों या विदेशी, हमारी अर्थव्यवस्था में पूंजी लगाने से कतराने लगते. ब्याज की दरें बढ़ जातीं और हमारी कंपनियां देश के बाहर कर्ज नहीं ले पातीं. बेरोज़गारी भी बढ़ जाती.

प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया उन पर रहम नहीं करती जो अपनी मुश्किलों को खुद हल नहीं करते हैं. आज बहुत से यूरोपीय देश ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं. वे अपनी ज़िम्मेदारियों का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं और दूसरों से मदद की उम्मीद कर रहे हैं. वे अपने कर्मचारियों के वेतन या पेंशन में कटौती करने पर मजबूर हैं ताकि कर्ज देने वालों का भरोसा हासिल कर सकें.

प्रधानमंत्री ने कहा कि डीजल पर होने वाले घाटे को पूरी तरह खत्म करने के लिए डीजल का मूल्य 17 रुपए प्रति लीटर बढ़ाने की ज़रूरत थी. लेकिन हमने सिर्फ 5 रुपए प्रति लीटर मूल्य वृद्धि की है. डीजल की अधिकतर खपत खुशहाल तबकों, कारोबार और कारखानों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बड़ी कारों और एस.यू.वी. के लिए होती है. इन सबको सब्सिडी देने के लिए क्या सरकार को बड़े वित्तीय घाटों को बर्दाश्त करना चाहिए? पेट्रोल के दामों को न बढ़ने देने के लिए हमने पेट्रोल पर टैक्स 5 रुपए प्रति लीटर कम किया है. यह हमने इसलिए किया कि स्कूटरों और मोटरसाइकिलों पर चलने वाले मध्य वर्ग के करोड़ों लोगों पर बोझ और न बढ़े.

मनमोहन सिंह ने अपना अर्थशास्त्र ज्ञान बताते हुये कहा कि हमने एक साल में रियायती दरों पर 6 सिलिंडरों की सीमा तय की है. हमारी आबादी के करीब आधे लोग, जिन्हें सहायता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, साल भर में 6 या उससे कम सिलिंडर ही इस्तेमाल करते हैं. हमने इस बात को सुनिश्चित किया है कि उनकी ज़रूरतें पूरी होती रहें. बाकी लोगों को भी रियायती दरों पर 6 सिलिंडर मिलेंगे. पर इससे अधिक सिलिंडरों के लिए उन्हें ज़्यादा कीमत देनी होगी.

एफडीआई को लेकर आलोचना झेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि संगठित खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की अनुमति देने से किसानों को लाभ होगा. हमने जो नियम बनाए हैं उनमें यह शर्त है कि जो विदेशी कंपनियां सीधा निवेश करेंगी, उन्हें अपने धन का 50 प्रतिशत हिस्सा नए गोदामों, कोल्डश स्टोरेज और आधुनिक ट्रांसपोर्टर व्यवस्थाओं को बनाने के लिए लगाना होगा. इससे यह फायदा होगा कि हमारे फलों और सब्जियों का 30 प्रतिशत हिस्सा, जो अभी स्टोरेज और ट्रांसपोर्टर में कमियों की वजह से खराब हो जाता है, वह उपभोक्ताओं तक पहुंच सकेगा. बरबादी कम होने के साथ-साथ किसानों को मिलने वाले दाम बढ़ेंगे और उपभोक्ताओं को चीजें कम दामों पर मिलेंगी.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pritish Barahath [pritish1108@gmail.com] JAIPUR - 2012-09-23 03:50:42

 
  अक्ल, ईमानदारी और कौशल भी पेड़ों पर तो लगता नहीं है, देश को ओबामा के हाथ में दे देना चाहिए!!! 
   
 

रवि केसरकर [] मुंबई - 2012-09-22 09:23:30

 
  आदरणीय प्रधानमंत्री जी, हर एक इन्सान जानता है कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते, हम तो उस पैसे की बात कर रहे है, जो स्विस बैंक पे रखा है , काला धन वापस लेके आओ तो हम जैसे आम आदमी आराम से रहे और हमपे ज्यादा भार नहीं आये ! 
   
 

arun [arunvsvarshney@gmail.com] mumbai - 2012-09-22 07:01:34

 
  हाँ मनमोहनजी यह तो सच है की पैसे पेड़ पर नहीं लगते ! पर क्या आप को लगता है ? की आम जनता पैसे पेड़ पर से तोडती है ! आप अपने उपर होने वाले अरबो रुपए के खर्च को कम क्यों नहीं करते जो अनउत्पाद्किए है और देस के भले के लिए तो कतई नहीं है 
   
 

Arif Mohd [arifjimohd@gmail.com] Lucknow - 2012-09-22 06:31:49

 
  पैसा पेड़ों पर तो लगता नहीं. सही बात है, जनता के तो पैसे का बाग लगा है, जो रोज़ खाने पीने की चीज़ों का भाव बढ़ जाता है. 
   
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