पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >कला >बात Print | Share This  

शाहिद आजमी की फिल्म पर विवाद

शाहिद आजमी की फिल्म पर विवाद

मुंबई. 1 अक्टूबर 2012

शाहिद आजमी


अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों और कथित चरमपंथियों का मुकदमा लड़ने वाले मुंबई के युवा वकील शाहिद आज़मी के जीवन पर बनाई गई फिल्म शाहिद को लेकर अभी से विवाद शुरु हो गया है. कट्टरपंथी संगठनों ने धमकी दी है कि फिल्म भारत में रिलीज नहीं होने दी जाएगी. इस फिल्म को टोरंटो फिल्म उत्सव में खूब प्रशंसा मिली. देखना ये है कि भारत में इस फिल्म को कैसा प्रतिसाद मिलता है. लेकिन फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता को उम्मीद है कि उनकी फिल्म भारत में भी चर्चा में रहेगी.

गौरतलब है कि युवा वकील शाहिद आज़मी की 11 फरवरी 2010 में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. शाहिद जब मारे गये तब वे महज 32 साल के थे. यूँ तो शाहिद की पारिवारिक जड़े आज़मगढ़ में थीं लेकिन वे मुंबई के, देवनार इलाक़े में जन्मे और पले-बढ़े. 1994 में भारत के चोटी के नेताओं की हत्या की ‘साज़िश’ के आरोप में पुलिस ने उनके घर से गिरफ़्तार कर लिया था. इसका एक मात्र साक्ष्य उनका क़बूलनामा था, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं था. फिर भी उन्हें छह साल की क़ैद हुई. दिल्ली के तिहाड़ जेल में रहते हुए शाहिद ने स्नातक के लिए दाख़िला कराया और अन्य क़ैदियों के कानूनी मामलों को निबटाने में मदद करना शुरु किया.

शाहिद आजमी 2001 में जब रिहा हुए तो घर आए और पत्रकारिता और क़ानून के स्कूल में साथ-साथ दाखिला लिया. तीन साल बाद, उन्होंने वक़ील मजीद मेनन के साथ काम करने के लिए वेतन वाले उप-संपादक पद को छोड़ दिया. यहां उन्होंने बतौर जूनियर 2,000 रुपये महीने पर काम शुरू किया. बाद में, उन्होंने अपनी ख़ुद की प्रैक्टिस शुरू कर दी जिसने एक निर्णायक फ़र्क़ पैदा किया. बतौर वक़ील महज 7 साल के अल्प समय में उन्हें न्याय की अपनी प्रतिबद्धता के लिए शोहरत और बदनामी दोनों मिली. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे एक ऐसे इंसान थे, जो इस व्यवस्था द्वारा उत्पादित किए गए, इस्तेमाल किए गए और बाद में 'ठिकाने’ लगा दिए गए.

शाहिद आजमी के इसी जीवन पर अंसल मेहता ने फिल्म बनाई है. शाहिद आजमी की भूमिका राजकुमार यादव इससे पहले रागिनी एमएमएस, लव सेक्स और धोखा जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं. हालांकि फिल्म भारत में कब परदे पर आएगी, इसकी तारीख तय नहीं हुई है. इसके पीछे एक बड़ा कारण कट्टरपंथी संगठनों द्वारा इस फिल्म का विरोध है. इन कट्टरपंथियों का कहना है कि शाहिद आजमी की इस फिल्म से आतंकवाद फैलाने वालों का हौसला बढ़ेगा. इन कट्टरपंथियों ने फिल्म के निर्देशक को धमकियां भी दी हैं.


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in