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स्टीव जॉब्स के बिना दुनिया

स्टीव जॉब्स के बिना दुनिया

रॉबर्ट स्कॉबल. बीबीसी 5 अक्टूबर 2012


पिछले साल इसी दिन स्टीव जॉब्स ने दुनिया को अलविदा कह दिया था लेकिन सच ये है कि स्टीव जॉब्स की कमी की भरपाई नहीं हो पाई है. कॉरपोरेट जगत में अक्सर ये सुनाई देता है कि हम ‘स्टीव जॉब्स की कमी’ महसूस करते हैं.

ये कमी कभी भी किसी को भी महसूस हो सकती है. मसलन एक कॉकटेल पार्टी के दौरान स्टीव जॉब्स के साथ काम करने वाले ऐपल के कर्मचारियों ने कहा कि उनके चीखने-चिल्लाने को सबसे ज्यादा ‘मिस’ करते हैं.

नए आई-फोन के लिए लाइन में खड़े, फोन के लॉन्च की प्रेस कॉन्फ्रेन्स सुनते या फोन की किसी दुकान के सामने से गुज़रते आम लोग भी अक्सर ये कहते सुनाई देते हैं कि स्टीव जॉब्स के बिना स्मार्टफोन्स की दुनिया नीरस हो गई है.

क्या कुछ बदला: हमें कुछ ऐसा देखने को नहीं मिला जो करामाती सोच या पहले से दिख रही चीज़ को नए सिरे से देखने का नज़रिया दे. ऐपल की प्रेस कॉन्फ्रेंस अब उतनी मज़ेदार नहीं हैं.

तकनीक पर लिखने वाले संवाददाता अब नई सोच के लिए ऐपल के बजाय माइक्रोसॉफ्ट जैसे कंपनियों का सहारा ढूंढ रहे हैं. ऐपल के कर्मचारी कहते हैं उनके लिए अब दफ्तर में काम करना आसान है लेकिन वो उस आपाधापी और उत्साह की कमी महसूस करते हैं.

इस साल भी ऐपल का मुनाफा बढ़ा है लेकिन वो उस सोच का नतीजा है जो से स्टीव जॉब्स अमली जामा पहना कर गए थे. क्या नए मुखिया टिम कुक भी स्टीव की तरह नया सोच पाएंगे? बड़ी कंपनियां बहुत चीज़ों पर टिकी होतीं है और ऐपल के पास स्टीव जॉब्स और उनकी टीम से मिला बहुत कुछ है लेकिन ऐसा क्या है जो स्टीव जॉब्स के जाने से चला गया है.

स्टीव जॉब्स के साथ उनके सामान बेचने की कला भी चली गयी है. जिस काम या चीज़ में कमी हो उसे निर्ममता से न करने का हनुर भी स्टीव जॉब्स के साथ चला गया है. ऐसा चीज़ों की पहचान और उन्हें बारीकी से देखना जो बेहद साधारण दिखती हों कॉरपोरेट जगत को स्टीव जॉब्स ने सिखाया. ये कला भी कहीं उनके साथ ही न खो जाए.

हम ये जानते हैं कि मोबाइल और तकनीक का ज़माना अभी शुरु हुआ है और एक लंबी दौड़ अभी बाकी है लेकिन स्टीव जॉब्स जैसे लोगों की कमी शायद इस मायने में खलेगी कि हम ये नहीं जान पाएंगे कि इस सब के बीच हम ऐसा क्या करते रहें कि तकनीक हर हाल में हमें गुलाम न बना पाए.


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