पहला पन्ना >राजनीति >मध्यप्रदेश Print | Share This  

दाऊद जैसे नहीं थे विवेकानंद

दाऊद जैसे नहीं थे विवेकानंद

भोपाल. 5 नवंबर 2012

स्वामी विवेकानंद


भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी भले मानते हों कि आध्यात्मिक संत विवेकानंद और अंडरवर्ल्ड के कुख्यात आतंकवादी दाऊद इब्राहिम का आईक्यू यानी इंटेलिजेंट कोसंट एक जैसा था. लेकिन स्वामी विवेकानंद के जीवन को जानने वाले इस बात से किसी भी तरह से इत्तेफाक नहीं रखेंगे कि आतंकवादी दाऊद इब्राहिम और स्वामी विवेकानंद में किसी भी स्तर पर कोई समानता हो सकती है.

स्वामी विवेकानन्द यानी नरेन्द्र नाथ दत्त वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे.उन्होंने अमरीका स्थित शिकागो में 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था. भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा. उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी.

12 जनवरी,1863 को कलकत्ता में जन्में विवेकानंद ने आरंभिक शिक्षा के बाद 1879 में कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया और 1880 में जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन में उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरु की. 1881 में श्रीरामकृष्ण परमहंस से उनकी मुलाकात हुई और एक साल बाद वे उनसे संबद्ध हो गये. अगले दो सालों में उन्होंने स्नातक की परीक्षा पास की. 1886 में श्रीरामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद स्वामी विवेकानंद ने वराह नगर मठ की स्थापना की और अगले साल वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा ले कर कार्य आरंभ किया. 1890-93 तक का समय परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण के रुप में गुजरा. 13 फरवरी, 1893 को उन्होंने प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकंदराबाद में दिया और 30 जुलाई, 1893 को वे शिकागो पहुंचे.

11 सितंबर, 1893 को विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान और 27 सितंबर, 1893 को यहीं पर अंतिम व्याख्यान दुनिया भर में सुप्रसिद्ध हुआ. 16 मई, 1894 को हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण, नवंबर 1894 में न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना, जनवरी 1895 में न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरंभ, अक्तूबर 1895 में लंदन में व्याख्यान, मई-जुलाई 1896 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान और लंदन में धार्मिक कक्षाएँ, 28 मई, 1896 को ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट और 1 मई, 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना जैसे विवेकानंद के काम ने भारत को एक अलग पहचान दी.

गुरुदेव रवींन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, ‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.’’

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था, ‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है. वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देखकर ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, ‘शिव !’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.’’

विवेकानंद का अमर वाक्य -उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ. अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा दे रहा है.