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सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर का निधन

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर का निधन

रायपुर. 08 जून 2009

 

देश के सुप्रसिद्घ रंगकर्मी हबीब तनवीर का निधन सोमवार तड़के 6.30 बजे भोपाल के एक निजी अस्पताल में हो गया. श्री तनवीर 85 साल के थे. वे पिछले एक महीने से गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे.

श्री तनवीर को फेफडे के इंफैक्शन के अलावा सेप्टीसीमिया भी था. एक सप्ताह पहले उनकी तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई और उन्हें भोपाल के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. जहां पर उन्हें जीवनरक्षक उपकरणों पर रखा गया था. लेकिन सोमवार तड़के उनका निधन हो गया.

1 सितंबर 1923 को रायपुर में जन्में हबीब तनवीर देश के वरिष्ठ रंगकर्मी थे. उन्होंने चरणदास चोर, आगरा बाजार जैसे कालजीवी नाटक रचे. श्री तनवीर नाटककार होने के साथ-साथ निर्देशक, कवि और अभिनेता भी थे. अपने करियर के शुरुआत में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी की और कई हिंदी फिल्मों में गाने लिखने के अलावा कुछ में अभिनय भी किया.

इसी दौरान वह प्रगतिशीन लेखक संघ और भारतीय जन नाट्स संघ (इप्टा) जैसे संस्थानों के भी सदस्य बने. इसके बाद सन 1954 में हबीब तनवीर दिल्ली आकर हिंदुस्तान थियेटर से जुड़ गए और वहीं रहकर कई मशहूर नाटकों का मंचन किया. कुछ साल तक दिल्ली में रहने के बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर निर्देशन और अभिनय का प्रशिक्षण लिया.

भारत वापस आने के बाद उन्होंने नया थियेटर नामक एक नाटक कंपनी शुरु की. इस नाटक ग्रुप के माध्यम से उन्होंने अनेक लोक कलाकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया. उन्होंने अपने नाटकों में हमेशा लोक कलाओं को महत्व दिया. श्री तनवीर को संगीत नाटक अकादमी के अलावा पद्मश्री और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्टित पुरस्कार भी मिले थे.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ABDUL ASLAM (aslamimage@rediffmail.com) KORBA

 
 थियेटर की दुनिया के बादशाह के इंतकाल की खबर से बड़ा दुख हुआ. लेकिन पूरी दुनिया उनको हमेशा याद करेगी क्योंकि उनके जैसा कलाकार कभी नहीं मरता. 
   
 

DR.PUSHPENDRAPRATAP (drpushpendrasingh@yahoo.co.in) BHOPAL

 
 दुखद खबर है अभी हाल ही में भोपाल में चरणदास चोर मंचित होने पर मिले थे. 
   
 

nasiruddin

 
 दुखद खबर। हबीब तनवीर का जाना उस पीढ़ी का अंत है, जिसने भारत में सामाजिक- राजनीतिक रूप से सजग रंगमंच की शुरुआत की। हबीब तनवीर ने अपनी एक खास शैली विकसित की, जो शहरी संभ्रांत थिएटर से एकदम अलग था।  
   

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