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नीतीश इसलिये गये पाकिस्तान

नीतीश इसलिये गये पाकिस्तान

पटना. 10 नवंबर 2012 बीबीसी


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुक्रवार नौ नवम्बर से आठ दिनों की पाकिस्तान यात्रा पर हैं. उन्होंने इसे सद्भावना यात्रा कहा है. लेकिन राजनीतिक हलकों में इसके कई मतलब निकाले जा रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी भाजपा से जनता दल यूनाइटेड जदयू की अलग धर्मनिरपेक्ष पहचान बनाना भी एक कारण माना जा रहा है. 11 सदस्यों वाले इस यात्रा दल में बिहार सरकार के मंत्रियों अधिकारियों और कुछ अन्य लोगों को शामिल किया गया है.

यह दल 16 नवम्बर तक पाकिस्तान में रहेगा और इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे.

पकिस्तान के क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना की मज़ार पर गुलपोशी, सिंध और पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्रियों से मुलाक़ात, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला जैसे ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण और वहां एक संस्था द्वारा आयोजित सेमीनार में 'विकास-दर' और 'सुशासन' विषय पर भाषण, यही उनके प्रमुख कार्यक्रम हैं. हाल ही में पाकिस्तान से जो एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बिहार के दौरे पर आया था, उसने नीतीश कुमार को पाकिस्तान आने का न्योता दिया था.

जानकार बताते हैं कि खुद मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी. फिर इस यात्रा को केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय से मंज़ूरी मिल गई.लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह यात्रा बिहार के राजनीतिक हलकों में ही नहीं, आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन गई है. इसे भाजपा से धीरे-धीरे दूरी बनाकर जदयू को एक अलग व्यापक जनाधार देने और मुस्लिम समुदाय को जदयू के और निकट लाने की कोशिश माना जा रहा है.

शायद यही कारण है कि नीतीश सरकार की साझीदार भाजपा ने मुख्यमंत्री की पाकिस्तान यात्रा को लेकर किसी तरह का उत्साह या समर्थन नहीं दिखाया है. भाजपा के नेता इस यात्रा पर कुछ विशेष टिप्पणी करने से भी कतराते हैं जबकि विपक्षी दलों ने इसे नीतीश कुमार की चुनावी राजनीति का एक हिस्सा कहा है.

राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का कहना है,"नीतीश पाकिस्तान गए हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन वहां उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि आरएसएस-भाजपा की मदद से सत्ता पाने या सांप्रदायिक तत्वों को साथ लेकर सरकार चलाने को नीतीश मजबूर क्यों हैं?"

वर्ष 2003 में लालू यादव भी भारत के संसदीय दल के सदस्य के रूप में पाकिस्तान यात्रा पर गए थे.

गांधीवादी विचारक रज़ी अहमद उस यात्रा को याद करते हुए कहते हैं,"उस समय ख़बरें आ रही थीं कि पूरी यात्रा के दौरान लालू ही वहां छाए रहे. खांटी बिहारी वाला उनका ख़ास अंदाज़ वहां आम लोगों को बेहद पसंद आया था. चूंकि नीतीश कुमार को भी वहां के लोग चाहते हैं, इसलिए उन्हें आमंत्रित किया गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस यात्रा से दोनों देशों के बीच की तल्ख़ी थोड़ी कम होगी.'' हालांकि इस बारे में बिहार में आम लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग मानते हैं और खुलकर कहते भी हैं कि नीतीश की इस यात्रा का मकसद ही है चुनावी लाभ के लिए मुस्लिम मतदाताओं को रिझाना.

जबकि दूसरी तरफ कई लोग ऐसा नहीं मानते और तर्क देते हैं कि मुस्लिम मतदाता किसी नेता के पाकिस्तान यात्रा पर जाने मात्र से उनके पक्षधर नहीं हो जाते हैं.

यहां सब्ज़ीबाग़ के कुछ बुज़ुर्ग मुस्लिमों ने इसपर दिलचस्प टिप्पणी की कि लालू की पाकिस्तान यात्रा के बाद हुए बिहार विधानसभा चुनाव में लालू-राबड़ी शासन की शिकस्त हुई थी यानी उनकी सत्ता चली गई थी. वहां खड़े एक युवक ने इस बात पर चुटकी लेते हुए कहा कि नीतीश जी को भी सम्भल जाना चाहिए और उन्हें किसी मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए.

कुछ लोग इस यात्रा को आगामी गुजरात विधानसभा चुनाव और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी जोड़कर देखते हैं. उनका कहना है कि इसी बहाने नीतीश कुमार अपने दल के चुनाव प्रचार के सिलसिले में गुजरात जाने से बचने का रास्ता निकाल चुके हैं. तर्क ये दिया जा रहा है कि गुजरात जाकर चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी और भाजपा से सीधे सियासी टकराव को नीतीश कुमार टालना चाहते थे. इसलिए उन्होंने बयान भी दिया था कि पाकिस्तान यात्रा के कारण गुजरात जाने का समय निकाल पाना उनके लिए संभव नहीं होगा.


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