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छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के माओवादियों से संबंध

छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के माओवादियों से संबंध

रायपुर. 19 दिसंबर 2012

माओवादी


माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के वन मंत्री विक्रम उसेंडी के साथ अपने गहरे रिश्तों का दावा किया है. माओवादियों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की ही महिला बाल विकास व खेल मंत्री लता उसेंडी के पिता नक्सली दस्तावेजों के प्रकाशन का काम करते रहे हैं. माओवादियों ने स्वीकार किया है कि रायपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन से उनके संबंध थे और उन्होंने सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य नारायण सान्याल को कानूनी मदद पहुंचाने के लिये विनायक सेन को 50 हजार रुपये भी दिये थे.

ये तमाम दावे पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी की किताब ‘उसका नाम वासु नहीं’ में किये गये हैं. देश के अलग-अलग इलाकों में सक्रिय सीपीआई माओवादी के सामान्य कार्यकर्ता से लेकर उनके महासचिव गणपति तक से की गई बातचीत पर आधारित इस किताब में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं. पेंग्विन इंटरनेशनल द्वारा हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ 19 दिसंबर बाजार में उतारी गई इस किताब को लेकर छत्तीसगढ़ में एक नई बहस शुरु हो सकती है. नक्सलियों के खिलाफ चले सलवा जुड़ूम को लेकर किताब में दावा किया गया है कि इसकी योजना भाजपा नेता और तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने बनाई थी. शंकर गुहा नियोगी के बेटे और बेटी के भी बतौर नक्सली कार्यकर्ता काम करने की बात कही गई है. माओवादियों ने माना है कि औद्योगिक घराना एस्सार ने भी माओवादियों को एक करोड़ रुपये दिये थे.

किताब में कनॉट प्लेस के कॉफी हाउस में एक नक्सली के साथ बातचीत का विवरण देते हुये शुभ्रांशु ने लिखा है- ... अब मुझे लगा कि अनिल से मेरा तालमेल बैठ गया था, तो मैंने दबाव डाला. ‘‘कुछ ज़मीनी बात करें? क्या तुम्हें इस बिनायक सेन के केस के बारे में कुछ मालूम है?’’

सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन को उनके तथाकथित माओवादी संपर्कों के लिए जेल भेजा जा चुका था. जिस समय मैं अनिल से मिला, मीडिया में उन्हें छुड़ाने की सशक्त मुहिम जारी थी. यहां तक कि कुछ नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने उनकी रिहाई के लिए ज़ोर डालते हुए, प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था.

‘‘क्या वे सच में आपके संदेशवाहक के रूप में काम कर रहे थे?’’ मैंने पूछा, हालांकि मुझे उत्तर की कोई आशा नहीं थी.

लेकिन अनिल ने तो बेझिझक कहा, ‘‘और क्या!’’

मुझे लगा कि उसे तथ्यों की ठीक जानकारी नहीं. तो मैंने पूछा, ‘‘और पीयूष गुहा की क्या कहानी है? उसको तो डॉक्टर सेन का सेदंशवाहक होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.’’

‘‘पीयूष तो हमारे नेता नारायण सान्याल जी का संदेशवाहक था, जैसे मैं प्रशांत के लिए हूं. डॉक्टर सेन, सान्याल से रायपुर जेल में मिलते थे.

‘‘1972 में जब पार्टी भंग की गई, तो नारायण सान्याल बिहार जाने वाले नेताओं में से एक थे. वे सीपीआई (एमएल) पार्टी यूनिटी दल के संस्थापक सदस्य थे.’’

‘‘हां दल भी तो कई थे- मैंने ही 32 तक गिने. कुछ पार्टियों में तो 10 मेंबर भी नहीं थे.’’ मुझे रुका न गया.

लेकिन अनिल ने बुरा नहीं माना, मुस्कुराते हुए वह बोला, ‘‘आप कह तो ठीक ही रहे हैं. एक समय था कि हमारे जितने नेता थे उतनी पार्टियां भी थीं. पर धीरे-धीरे वे आपस में जुड़ भी रही हैं. नारायण दा की पार्टी यूनिटी और हमारे सीपीआई (एमएल) पीपुल्स वार का 1998 में विलय हो गया. पहले पीयूष पार्टी यूनिटी का फुल टाइम सदस्य था. फिर उसने पार्ट टाइम सदस्यता ली, लेकिन काम वह हमेशा फुल टाइमर से भी ज़्यादा ही करता था. पार्टी के कुरियर के काम पर पर्दा डालने के लिए नारायण दा ने उसके लिए तेंदू पत्ता कॉन्ट्रैक्टर का काम भी दिलवाया.

‘‘गिरफ्तारी के बाद जब नारायण सान्याल को कानूनी कार्रवाई के लिए पैसों की ज़रूरत थी, पीयूष ही उड़ीसा के तत्कालीन पार्टी सेक्रेटरी सब्यसाची पांडा से 50000 रुपए लेकर बिनायक सेन को रायपुर में पहुंचाने गया. होटल से उसने बिनायक दा से फोन पर बात की थी- उनका फोन शायद टैप्ड रहा होगा. पीयूष को पुलिस ने होटल से उठा लिया. जब तक डॉक्टर सेन और उनकी पत्नी होटल पहुंचे पीयूष गायब हो चुका था और होटल के मैनेजर ने यह मानने से ही इनकार कर दिया कि पीयूष नाम का कोई व्यक्ति वहां ठहरा था.

‘‘उस के बाद बिनायक दा किसी काम से कोलकाता चले गए. उधर जब हमें पीयूष की कोई ख़बर नहीं मिली तो हम चिंतित हुए. मैं बिनायक दा से कोलकाता के पास कल्याणी में उनकी मां के घर मिला और रायपुर में पीयूष को खोजने के लिए मदद मांगी, और उन्होंने मेरी बात मान भी ली- बिनायक दा से वह मेरी पहली मुलाकत थी.’’

कहानी का यह पक्ष था तो दिलचस्प लेकिन लिखने के लिए मैं इसकी पुष्टि कैसे करता. लेकिन फिर मुझे सब्यसाची पांडा से मिलने का मौका मिला, जो तब उड़ीसा में माओवादियों के शीर्ष नेता थे. मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने 50,000 रुपए डॉक्टर सेन को क्यों भेजे थे. शायद मेरे प्रश्न पूछने का ढंग कुछ ऐसा था कि उन्हें लगा कि मुझे यह जानकारी पहले से ही है. या फिर वे इस प्रश्न से हड़बड़ा गए. जो भी हो उन्होंने पीयूष को नारायण सान्याल के लिए 50,000 रुपए देने की बात मानी. मैंने सब्यसाची से पूछा कि उन्हें वे पैसे कभी वापस मिले, तो उन्होंने यही कहा कि पीयूष पैसे पहुंचाता इसके पहले वह गिरफ्तार हो गया और इस पूरे प्रकरण का हिसाब वे पार्टी की सेंट्रल कमेटी को दे चुके हैं.

बाद में मैंने डॉक्टर बिनायक सेन से उनका पक्ष जानने की कोशिश की. उनके वकील ने फोन पर केवल यही कहा कि यह सब सुनी-सुनाई बात है, इसमें कोई तथ्य नहीं....

किताब में शुभ्रांशु चौधरी ने अनिल से अपनी मुलाकात का विवरण देते हुये लिखा है कि उन्होंने अनिल से पूछा.... ‘‘तो आपके लिए छत्तीसगढ़ में कितने बंगाली काम करते होंगे?’’ मैंने अनिल से बांग्ला में पूछा. मुझे केवल एक खंडन की आशा थी- लेकिन अनिल तो उस दिन मुझे एक के बाद एक झटके देने पर आमादा था.

‘‘मैं यह तो नहीं कहूंगा कि बिनायक दा पार्टी के लिए काम करते थे, लेकिन हां, जीत गुहा नियोगी ज़रूर सदस्य थे- अगर आप उन्हें बंगाली मानें तो. बिनायक दा तो केवल नारायण दा के पुराने मित्रा थे और व्यक्तिगत रूप से उनकी मदद कर रहे थे. लेकिन जीत संभवतः पार्टी में काफी ऊंचे पद पर थे- एरिया कमेटी सदस्य. और उनकी बहन मुक्ति गुहा नियोगी ने दंडकारण्य में हमारे स्क्वाड के साथ कुछ समय बिताया. ऊपरी तौर पर (ओवर ग्राउंड) भी वे रायपुर के कॉलेजों में हमारे लिए काम करती थीं.....
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ahfazrashid [ahfazrashid@gmail.com] raipur - 2012-12-19 04:54:14

 
  नक्सली-सरकार गठबंधन के कारण ही नक्सली आम और निहत्थे लोगों पर अपना कहर ढाते है। राजनांदगांव के एक भाजपा के विधायक की तो बाकायदा वीडियो टेप हैं मेरे पास। एक नक्सली के विवाह समारोह में वे सबका अभिनन्दन कर उन्हें उपहार दे रहे हैं। मैं एक फ़िल्म \\\"लाल-माटी\\\" में इन पर भी फोकस कर रहा हूँ। 
   
 

lakhan singh [bhagatsingh788@gmail.com] bilaspur - 2012-12-19 04:30:56

 
  ऐसी सनसनीखेज पत्रकारिता शुभ्रांशु भी कर सकते हैं ऐसा सुना तो पहले भी था, लेकिन भरोसा नहीं था. मेरी कल ही शुभ्रांशु जी से बात हुई थी, उन्होंने कहा था कि उन्होंने बिनायक सेन से भी बात की है और उनका पक्ष रखा है. लेकिन लगता है कि ये बात गलत थी, जो अभी तक पढ़ने को मिला है उससे लगता है कि ये रिपोर्टिंग एकतरफा और भ्रम फैलाने के लिए है. मैंने इसके पहले ऐसा कभी किसी माओवादी नेता ने नहीं सुना कि वो इस तरह का साक्षात्कार देते हों, हम सब पुस्तक का इंतजार कर रहे हैं, पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया देंगे ही, तीन दिन पहले पीयूसीएल की EC मीटिंग में इसकी चर्चा हुई थी कि कुछ ऐसा आने वाला है. फिलहाल तो यही कह सकते हैं कि माओवादी नेता के हवाले के नाम से बेहद शरारतपूर्ण और चर्चा में आने के लिए ये सब लिखा गया है. 
   
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