पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >खेल > Print | Share This  

क्लॉडियस को बिलासपुर ने भुला दिया

क्लॉडियस को बिलासपुर ने भुला दिया

बिलासपुर. 21 दिसंबर 2012. सतीश जायसवाल

leslie claudius bilaspur


बिलासपुर के लेस्ली वाल्टर क्लॉडियस ने अपने गौरवशाली जीवन का अध्याय कोलकाता में पूरा किया. अपने समय के मशहूर हॉकी खिलाड़ी और ओलंपियन लेस्ली वाल्टर क्लॉडियस का 20 दिसंबर को कोलकाता में निधन हो गया. क्लॉडियस का निधन कोलकाता में हुआ, शायद इसलिए यह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का शोक नहीं हुआ.

क्लॉडियस के साथ भारतीय हॉकी से स्वर्ण युग का वह गौरवशाली अध्याय भी अब अतीत बन गया, जो छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का अपना गौरव था. लेकिन बिलासपुर ने इस गौरव को अपना नहीं समझा. वह शायद इसलिए भी कि बिलासपुर रेलवे की उपलब्धियां, पता नहीं क्यों, बिलासपुर शहर की उपलब्धियां नहीं बन पायीं ? और बिलासपुर रेलवे यह नहीं समझ पाया की बीएनआर यानी बंगाल नागपुर रेलवे के क्लॉडियस की उपलब्धियों को बिलासपुर एसईसीआर यानी साउथ ईस्ट सेन्ट्रल रेलवे अपना कैसे माने?

इस दुविधा को दूर करने में बिलासपुर की एंग्लो इंडियन समुदाय से निर्वाचित सांसद इंग्रिड मैक्लाउड भी शायद मददगार नहीं हो पाएंगी. क्योंकि, वो खुद भी अभी तक नहीं समझ सकी थीं कि क्लॉडियस का गौरव बिलासपुर का है, बिलासपुर रेलवे का है और बिलासपुर एंग्लोइंडियन समुदाय का भी है. यदि इस बात को समझा गया होता तो क्लॉडियस को उनके लिए अपेक्षित सम्मान के साथ बिलासपुर में ही रहने के लिए आग्रह किया गया होता.

1927 में बिलासपुर में जन्मे लेस्ली वाल्टर क्लॉडियस बंगाल- नागपुर रेलवे की फुटबाल टीम के खिलाड़ी थे. लेकिन, खड़गपुर में होने वाले एक हॉकी मैच के लिए उन्हें ''सब्सीट्यूट'' या '' एवजी खिलाड़ी'' के तौर पर हॉकी टीम में जगह दी गयी. और फिर कुछ ऐसा हुआ कि भारतीय हॉकी की कल्पना क्लॉडियस के बिना असंभव हो गयी. खिलाड़ी चयन टीम के अध्यक्ष की हैसियत में, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने तो कह दिया था-क्लॉडियस स्वयं अपना चयनकर्ता है. चयन समिति के लोगों को तो अन्य खिलाडियों का चयन करना पड़ता है.

यह जानना दिलचस्प होगा कि हॉकी टीम में खेलने के लिए क्लॉडियस को अपनी हॉकी करीब 3 इंच छोटी करनी पडी थी. क्योंकि उनकी लम्बाई कम थी. क्लॉडियस की लम्बाई मात्र 5 फीट 2 इंच थी. लेकिन भारतीय हॉकी को उन्होंने जो ऊंचाई दिलाई, वह देश की हॉकी का स्वर्णिम अध्याय है.

भारतीय हॉकी टीम ने सबसे पहली बार लंदन ओलम्पिक में हिस्सा लिया था. और उसमें क्लॉडियस शामिल थे. बाद में 1952 में हेलसिंकी ओलम्पिक और 1956 में मेलबर्न ओलम्पिक में भी क्लॉडियस ने भारतीय हॉकी का प्रतिनिधित्व किया. इन दोनों ओलम्पिक से भारतीय टीम ''स्वर्ण'' जीत कर लौटी थी.

1960 के रोम ओलम्पिक में भी क्लॉडियस ने भारतीय हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया. लेकिन वहाँ से भारतीय टीम को ''रजत'' के साथ ही लौटना पडा था. भारत के लिये 100 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले पहले खिलाड़ी क्लॉडियस को 1971 में पद्मश्री दिया गया था और हॉकी में सर्वाधिक ओलंपिक पदक जीतने के मामले में उनका नाम उधम सिंह के साथ गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भी दर्ज किया गया लेकिन बिलासपुर शहर की किसी सड़क या चौक-चौराहे तक के नाम क्लॉडियस के नाम पर नहीं रखे गये.


अपने खिलाड़ियों के प्रति कैसा सम्मान प्रदर्शित किया जा सकता है, लंदन ओलम्पिक ने उसका उदाहरण दुनिया के सामने रखा. ओलम्पिक के दौरान लंदन की ट्यूब रेल स्टेशनों के नाम, ओलम्पिक अवधि के लिए दुनिया भर के खेल नायकों के नाम पर रखे गए. हॉकी के जादूगर ध्यान चंद और बिलासपुर के क्लॉडियस के नाम पर भी उन ट्यूब रेल स्टेशनों के नाम रखे गए थे. लेकिन यह चकित करने वाली बात है कि क्लॉडियस को उनके ही शहर बिलासपुर और छत्तीसगढ़ राज्य में लगभग भूला दिया गया.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

anil pandey [] raipur - 2012-12-21 17:00:46

 
  एक ऐसे खिलाड़ी को भुला देना जिसने बिलासपुर का नाम देश में और देश का नाम दुनिया भर सें रोशन किया हो भुला देना कैसे संभव हुआ. वास्तव में यह कहना उचित होगा कि जब हम अपने राष्ट्रीय खेल हाकी को ही भूलते जा रहे हैं तब हाकी खिलाड़ी को कोई क्यों कर याद रखना चाहेगा.  
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in