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मेरी बेटी का नाम ज्योति सिंह पांडेय था

मेरी बेटी का नाम ज्योति सिंह पांडेय था

बलिया. 6 जनवरी 2013

ज्योति सिंह पांडे


नदा फरहद, जलीस अंद्राबी की रिपोर्ट

अपने जघन्य बलात्कार और हत्या के बाद उसे देश की बेटी ही बुलाया जा रहा है लेकिन आज, उसके टूटे हुए पिता की इजाज़त से हम उसका नाम उजागर कर रहे हैं- ज्योति सिंह पांडे. उसके बहादुर पिता 53 वर्षीय बद्री सिंह पांडे ने ब्रिटिश अखबार ‘मिरर’ से कहा- हम दुनिया को उसका नाम बताना चाहते हैं. मेरी बेटी ने कोई गलत काम नहीं किया. उसने अपनी रक्षा करते हुए जान गंवाई. मुझे अपनी बेटी पर फख्र है, उसका नाम जाहिर करने से उन तमाम औरतों को हिम्मत मिलेगी जो ऐसे हमलों के बाद बच पाई हैं, मुझे अपनी बेटी से हिम्मत मिलेगी.

हमने बद्री सिंह पांडे और उनके परिवार से उत्तरप्रदेश स्थित उनके पैतृक गांव बलिया में साक्षात्कार किया. वह शोक मनाने दिल्ली के अपने घर से यहां आए हैं -दिल्ली का घर उन्हें हर पल उस बर्बर यौन हमले की याद दिलाता है जो 23 बरस की ज्योति पर उस समय हुआ, जब उसे अपने पुरुष मित्र के साथ धोखे से एक बस में बैठाया गया. उनकी पत्नी 46 वर्षीय आशा हमसे बात करने की हालत में नहीं थी.

बद्री पांडे ने कहा- पहले मैं ऐसा करने वालों का चेहरा देखना चाहता था, लेकिन अब ऐसी कोई इच्छा नहीं है. मैं सिर्फ इतना सुनना चाहता हूं कि अदालत ने उन्हें सजा दी, और उन्हें फांसी हो गई. उन छहों को फांसी होनी चाहिए. वह जानवर हैं. उन्हें ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो इस बात की मिसाल बने कि समाज ऐसी बातों की इजाज़त नहीं देगा.

जिस दिन उन्हें अपनी इकलौती बेटी की यातना की खबर मिली, उस दिन को याद करते हुए बद्री ने कहा कि 16 दिसंबर की रात, साढ़े दस बजे वह रात पाली से दिल्ली एयरपोर्ट से लौटे थे. वह वहां कुली के रूप में काम करते हैं. उनकी पत्नी ज्योति को लेकर चिंतित थी, उनकी मेडिकल स्नातक बेटी सिनेमा देखकर घर नहीं लौटी थी.

वे बताते हैं- हमने उसके, और उसके दोस्त के मोबाईल पर फोन करना शुरू किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. फिर रात सवा ग्यारह बजे हमें दिल्ली के अस्पताल से फोन मिला, कि हमारी बेटी के साथ हादसा हो गया है. उन्होंने अपने एक दोस्त से उन्हें मोटर बाईक पर ले जाने को कहा. उन्होंने कहा- जब मैंने उसे पहले देखा वह बिस्तर पर आंखें बंद किए पड़ी थी.

मैंने उसके माथे पर हाथ रख उसका नाम लिया तो उसने आंखें खोली. वह रोने लगी और उसने कहा कि उसे दर्द हो रहा है. मैंने उसे हिम्मत रखने को कहकर ढांढस बंधाया, कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. पिता को उस वक्त तक क्या हुआ, इसका पता नहीं था. आखिरकार एक पुलिस वाले ने उन्हें सब बताया. ज्योति और उसका 28 वर्षीय दोस्त अवींद्र घर आने के लिए एक बस में चढ़े थे, लेकिन बस चालक, उसके सहायक और चार अन्य लोगों ने उन्हें ढाई घंटे तक नर्क की सैर करवाई, दोनों को लोहे की छड़ों से पीटा गया और दिल्ली एयरपोर्ट जाने के रास्ते पर उन्हें नंगा फेंके जाने के पहले ज्योति का बार-बार बलात्कार किया गया. उन्हें जहां फेंका गया, वह जगह बद्री के काम की जगह से कुछ ही गज दूर थी.

बद्री पांडे ने कहा- मैंने अपनी पत्नी और बेटों को फौरन अस्पताल आने को कहा- लेकिन मैं उनसे बलात्कार की बात नहीं कह पाया. पहले दस दिन ज्योति को होश आता जाता था, और उम्मीद थी कि वह बच जाएगी. पिता ने कहा- डॉक्टरों ने उसे बचाने की सारी कोशिशें कीं, कुछेक बार वह बोली, लेकिन ज्यादातर उसने इशारों में बात की. उसे मुंह में खाना देने की नली लगी हुई थी, उसके लिए बोलना मुश्किल था, लेकिन उसने कागज पर लिख कर कहा कि वह जीना चाहती थी. वह ठीक होकर हमारे साथ रहना चाहती थी, लेकिन आखिरकार तो भाग्य में जो लिखा था वही होना था. ज्योति ने पुलिस को दो बार बयान दिए, लेकिन वह वहां बैठ नहीं पाए, क्योंकि उनकी बेटी के साथ जो हुआ उसे सुनकर वह बहुत व्याकुल हो गए थे.

बद्री सिंह पांडे ने कहा- मेरी पत्नी ज्योति के बयान देते समय उसके साथ थी, लेकिन वह सब सुनकर वह बहुत रोई. उसने मुझे सब बताया. जो हुआ उसे बयान करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं. मैं इतना ही कह सकता हू कि वह इंसान नहीं, वह जानवर भी नहीं है. वह इस दुनिया के ही नहीं है. वह भयानक था और मैं मनाता हूं कि उसे जो बर्दाश्त करना, पड़ा वैसा किसी के साथ ना हो.

वह बहुत रोई, उसे बहुत दर्द होता था, अपनी मां और भाइयों को देखते ही वह फिर रोई. लेकिन उसके बाद उसने हिम्मत जुटा ली, यहां तक कि उसने हमें हौसला देने की कोशिश की और हमें यह ढांढस बंधाती रही कि सब ठीक हो जाएगा. उसकी हालत बिगडऩे पर डॉक्टरों को उसकी अंतड़ियां निकालनी पड़ीं. वह उसे बॉक्सिंग डे के दिन विशेषज्ञों से इलाज करवाने सिंगापुर ले गए. उन्होंने कहा-मैंने उसे कहा सब ठीक हो जाएगा, और हम जल्द घर जाएंगे. वह घर जाने की बात सुनकर बहुत खुश थी, वह मुस्कुराई भी.

मैंने अपना हाथ उसके माथे पर रखा, उसने पूछा कि मैंने कुछ खाया या नहीं, फिर उसने मुझे इशारे से सोने को कहा. मैंने उसका हाथ थाम कर चूम लिया. मैंने उसे आराम करने को कहा और कहा कि चिंता ना करे. उसने अपनी आंखें बंद कर ली.

ज्योति जब अपनी जिंदगी के लिये संघर्ष कर रही थी, हजारों लोगों ने सडक़ों पर उतरकर छहों अभियुक्तों के लिए फांसी और नए बलात्कार कानूनों के लिए प्रदर्शन किया, लेकिन तीन दिन बाद ही, 29 दिसम्बर को उसे जानलेवा दिल का दौरा पड़ा.

बद्री पांडे ने कहा- मेरी दिली इच्छा थी कि कि वह जीती. भले ही उसे उस हमले की यादों और उसके बाद पहुंचे सदमे की याद में जीना पड़ता. उसके जाने से हम सब टूट गए हैं. हमारे जीवन में भारी खालीपन पैदा हो गया है. वह हमारी दुनिया थी. हमारी जिंदगियां उसी के आसपास घूमती थीं. उसकी गैर मौजूदगी बहुत दुखदाई है. उसके बिना आने वाले दिनों की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

बद्री सिंह पांडे ने कहा कि ज्योति का दोस्त अवीन्द्र उसका ब्वाय फ्रेंड नहीं था, वह केवल एक हिम्मती दोस्त था जिसने उसे बचाने की कोशिश की. उन्होंने कहा- उसने कभी शादी की इच्छा नहीं जताई. वह केवल पढ़ाई पर ध्यान दे रही थी, और पहले नौकरी करना चाहती थी. बद्री ने यह भी बताया कि ज्योति ने बताया था कि अवीन्द्र ने उसे बचाने की कितनी कोशिशें कीं. वह अपनी मां को बताती कि वह ज्योति को बचाने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह उसे लोहे की छड़ से मारते रहे.

बद्री सिंह पांडे के पास अब डॉक्टर बनने के उनकी बेटी के सपने की यादें भर बची हैं. उन्होंने कहा -मैंने उसे कहा कि मेरे पास उसे यह विषय पढ़ाने के पैसे नहीं थे, लेकिन उसने तय कर रखा था, वह डॉक्टर बनकर बहुत से पैसे कमाकर बार-बार विदेश जाना चाहती थी.

वे जब दिल्ली आए, वह महीने के 150 रुपये ही कमाते थे, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए कुछ जमीन बेच दी, और आज वह जो 5600 रुपये कमाते हैं. उसमें से जितना बचा पाते, बचाते. बद्री पांडे कहते हैं- मेरी तनख्वाह में आज दिल्ली में रहना बहुत मुश्किल है, लेकिन ज्योति हमेशा कहती कि वह सब कुछ बदल देगी. एक बार नौकरी मिलने पर वह हमारी जिंदगी बदल देना चाहती थी.

ज्योति ने अपना चार साल की फिजिय़ोथेरेपी की पढ़ाई दिल्ली से बाहर पूरी ही की थी, उस पर जब हमला हुआ. वह अपनी इंटर्नशिप कर रही थी. उसके भाई 20 वर्षीय गौरव सिंह और 15 वर्षीय सौरभ सिंह अपनी बड़ी बहन के करीब थे, और उन्हें उसके बिना जिंदगी मुश्किल लग रही है.

गौरव ने कहा- उनके बिना जिंदगी बहुत मुश्किल होगी. उनके राह दिखाए बिना मुझे पता नहीं मैं जि़ंदगी में क्या करूंगा. पूरे देश ने जैसे उनका साथ दिया है, उससे बद्री सिंह पांडे और उनका परिवार द्रवित है. वह कहते हैं- भारत के लोगों ने हमें अपना नुकसान सहने की ताकत दी है. मुझे लगता है जैसे वह मेरी अकेले की बेटी नहीं थी, पूरे देश की बेटी थी. मैं अखबारों में बलात्कारों की खबरें पढ़ता था, लेकिन मुझे उसमें बहुत समझ नहीं आता था. इस क्रूरता के खिलाफ प्रदर्शन कर के हमारा साथ देने वालों का मैं शुक्रगुज़ार हूं.

बद्री सिंह पांडे को लगता है कि इसके बाद मां-बाप अपने लडक़ों को औरतों की इज्जत करना सिखाएंगे. वह कहते हैं- इससे पुलिस अकेले नहीं निपट सकती, मां-बाप को अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए. अपनी बेटी ज्योति के सपनों की बातें करते हुए उनके चेहरे पर चमक आ गई. उन्होंने हमें अपना पारिवारिक एलबम दिखाया. हर तस्वीर में उनकी प्यारी बेटी मुस्कुराती दिखी. ज्यादातर में उसने पश्चिमी लिबास पहन रखा था. उसे पारंपरिक परिधान साड़ी के मुकाबले यही पसंद था. वह अक्सर अपने लंबे चमकीले गहरे काले बाल खुले ही रहती थी- उन्हें कभी नहीं बांधती थी.

(बद्री सिंह पांडे के अनुरोध को ध्यान में रखते हुए हम उसकी तस्वीर नहीं दे रहे हैं. उसकी तस्वीर फिर कभी जारी करेंगे. भारतीय कानून के मुताबिक बलात्कार की शिकार महिला या उसकी मौत के बाद, उसके परिवार की इजाजत के बिना उसका नाम नहीं छापा जा सकता. आज के लिए उसके परिवार के लिए इतना ही काफी है कि उन्होंने दुनिया को अपनी अनमोल बिटिया का नाम बताया है.) ब्रिटेन के अखबार ‘मिरर’ से साभार. अनुवाद- छत्तीसगढ़

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sudhir singh [sudhir198514@yahoo.com] Udaipura Ballia up - 2013-04-28 20:44:13

 
  मैं उदयपुरा बलिया यूपी का रहने वाला हूं, मैं इस घटना को सुन कर बहुत दुखी हुआ हूं, मैं चाहता हूं कि ऐसे अपराधियों को तुरंत फांसी दे देनी चाहिए, न कि कानून को इंतजार करना चाहिए. और महिलाओं को सुरक्षा दी जाए ताकि और महिलाओं के साथ ऐसी घटनाएं न हों. भगवान निर्भया की आत्मा को शांति दे. 
   
 

devendra gupta [devkorba@sify.com] korba - 2013-01-07 16:26:53

 
  बद्रीजी और उनके परिवार को मेरा सलाम, भगवान उन्हें दुख सहने की शक्ति दे.  
   
 

sunil [kumarsunil130@yahoo.in] delhi - 2013-01-07 13:40:49

 
  I think this is most tragic story. Only hanged till death to accused (all) will give rest to soul of victim. God will give the powers to whole family to bear such loss.  
   
 

Vijay Vaishnav [vijay.vaishnav186@rediffmail.com] Bhilai - 2013-01-07 06:45:16

 
  सच में. उन कमीनो की क्रूरता को सुनकर खून खौल उठता है.. `ज्योति जी` ने एक नयी ज्योति जलाई की आगे ऐसा किसी के साथ न हो.... और ऐसे दरिन्दे पैदा न हो.... 
   
 

Nisha [] Rudrapur - 2013-01-07 06:21:40

 
  ऐसे लोगों को कठोरतम सजा दी जानी चाहिये और यह सजा सार्वजनिक तौर पर किसी चौक-चौराहे पर दी जाये. 
   
 

bheemsain swami [] sriganganagar,rajasthan - 2013-01-07 03:10:05

 
  वे लोग इंसान नहीं हैवान थे. उन लोगों को जीने का कोई हक नहीं है लेकिन मौत की सजा भी उनके लिए बहुत कम है. उन्हें ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि वो जिंदा रहे लेकिन हर पल अपनी मौत की भीख मांगे लेकिन उन्हें वो भी नसीब न हो. ज्योति सिंह को दिल से सलाम उसके जज्बे के लिए. We all and all of India miss you. 
   
 

anil pandey [] raipur - 2013-01-06 16:57:13

 
  अच्छा ही हुआ पीड़ित युवती का नाम पहले उजागर नहीं हुआ. वरना लोग इसमें भी धर्म और जाति को लेकर बयानबाजी करने से नहीं चूकते. उस स्थिति में शायद मामले के खिलाफ उठी आवाजों को इतनी अहमियत भी नहीं मिल पाती.  
   
 

लाल्टू [] - 2013-01-06 15:16:53

 
  आइए हम कल्पना में ही एक दूसरे का हाथ थाम कर कुछ देर रो लें। पर जैसा कुमार विकल ने लिखा है रोने के बाद हम सोएँ नहीं - आज अंधकारवादी ताकतों को गला फाड़कर बतलाएँ कि हमारी अपनी बेटियाँ जब मर्जी जहाँ मर्जी जो मर्जी कपड़े पहन कर जाएँगी। हमारी बेटियाँ जैसा चाहे जिएँगी। दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं रोक पाएगी। धरती की बेटियो, जिओ। फूल बन कर खिलो। मत डरो, हमें भी डरने से रोको।  
   
 

pradeep soni [pradeepsoni1008@gmail.com] bilaspur - 2013-01-06 14:55:07

 
  ईश्वर इस परिवार को संबल दे. शायद आज उसे (ईश्वर) को भी दुख होगा कि इन 6 बंदों को भी मंने बनाया था.  
   
 

ASHIS TRIVEDI [ashistrivdi1@gmail.com] BALLIA - 2013-01-06 14:16:52

 
  अपने अंदर घुटन महसूस हो रही है. दुनिया में ऐसे दरिंदों को जीने का कोई हक नहीं. 
   
 

GURU SARAN LAL [] BILASPUR - 2013-01-06 13:50:24

 
  बद्री सिंह जी का साहस काबिले तारीफ है. भगवान उन्हें दुख सहने का साहस दे. यहीं दुआ है मेरी. 
   
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