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यौन प्रताड़ना अध्यादेश पर मंथन बाकी

यौन प्रताड़ना अध्यादेश पर मंथन बाकी

नई दिल्ली. 04 फरवरी 2013. बीबीसी


यौन हिंसा संबंधी अध्यादेश को लेकर आलोचना का सामना कर रही सरकार ने अब अपने बचाव में कहा है कि अध्यादेश में सुझाए गए प्रावधानों पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई है और आने वाले संसद सत्र में सभी पार्टियों के साथ इस पर चर्चा की जाएगी. केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंज़ूर किए गए इस अध्यादेश पर हाल ही में राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे.

कई महिला संगठनों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया था कि वे इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करें क्योंकि इसमें जस्टिस वर्मा आयोग की सिफ़ारिशों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है.

सोमवार को एक प्रेस वार्ता में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, “ये कहना ठीक नहीं होगा कि जस्टिस वर्मा के सुझावों को कैबिनेट ने खारिज कर दिया है. अध्यादेश पर सभी राजनीतिक पार्टियों से संसद में चर्चा की जाएगी अभी इस अध्यादेश में बदलाव आएंगे.”

संसद का बजट सत्र 21 फरवरी से शुरू हो रहा है और इन सुझावों को कानून में परिवर्तित करने के लिए संसद को छह सप्ताहों के भीतर इसे पास करना होगा. दरअसल अध्यादेश में सुझाए गए कई प्रावधानों पर समाज के कई तबकों की राय बंटी हुई है. शादी के बाद पत्नी की मर्जी के बिना यौन संबंध बनाना, आफसपा यानी आर्मड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत सेनाकर्मियों का बचाव और नाबालिगों के लिए बनाए गए कानून में संशोधन का मुद्दा विवादों में छाया हुआ है.

पी चिदंबरम ने कहा कि इन सभी मुद्दों पर मत बंटा हुआ है और संसद में चर्चा के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा. साथ ही उन्होंने कहा कि अध्यादेश को कानून बनाने से पहले सरकार संसद के अलावा पुलिस और सेना का मत भी जानना चाहेगी.  जस्टिस वर्मा ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शादी के बाद अगर पति अपनी पत्नी की मर्जी के बिना यौन संबंध बनाता है, तो उसे बलात्कार माना जाए. लेकिन सरकार ने अपने अध्यादेश में इस सुझाव को ठुकरा दिया था.


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