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फिक्की में मोदी का फंडा

फिक्की में मोदी का फंडा

नई दिल्ली. 8 अप्रैल 2013

नरेंद्र मोदी


गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को फिक्की में महिला उद्योगपतियों को संबोधित करते हुये कहा कि गुजरात सरकार ने राज्य में कांग्रेस द्वारा खोदे गए गड्ढों को भरने का काम किया है, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है. उन्होंने कहा कि गुजरात ने हमने महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम किया है, केवल सैद्धांतिक बातें नहीं की हैं. हालांकि पिछले 10 सालों में उनके कार्यकाल में महिलाओं का लिंगानुपात गिरने के मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोला. बाल लिंगाणुपात 964 से 886 पहुंच जाने के मामले में भी मोदी खामोश रहे.

नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में गुजरात की दो अनपढ़ महिलाओं जसूबेन और इंदूबेन की कामयाबी की कहानी भी सुनाई. मोदी ने कहा कि अहमदाबाद में जसूबेन का पिज्जा बड़ा पॉप्युलर है. जसूबेन के पिज्जा हट के बगल में कोई पढ़ा लिखा नौजवान खड़ा होता है, तो उनका ही पिज्जा खाता है. अब आज मीडिया के लोग अहमदाबाद जाएंगे और खोजेंगे. जसूबेन कलावती जैसी तो नहीं है. और इसलिए मै कह दूं कि उनका पांच साल पहले स्वर्गवास हो चुका है. जसूबेन के निधन के पांच साल बाद भी उसका पिज्जा बड़ा हिट है.

उन्होंने कहा कि आज फाइव स्टार होटलों के मेन्यू में भी पापड़ के लिए लिज्जत का जिक्र होता है. उन्होंने कहा कि इसके पीछे आदिवासी बहनों की मेहनत है. उन्होंने 80 रुपये से कारोबार शुरू किया और अब यह अरबों-खरबों में पहुंच गया है. इसी तरह इंदूबेन का खाखरा भी बड़ा फेमस है. मोदी ने कहा कि अमूल का पूरा आंदोलन महिलाओं के कारण ही सफल हो पाया. उन्होंने हर फैसले में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने पर जोर दिया.

मोदी ने महिला सशक्तिकरण की बात पर कहा कि पुरुषों की सोच में आज भी बदलाव नहीं आया है. आज भी महिला को परिवार में ही अलग थलग करके रखा जाता है. उन्होंने इस विचारधारा को बदलने पर जोर दिया. मोदी ने कहा कि गुजरात में महिलाओं ने अपने दम पर छोटे छोटे रोजगार स्थापित किए हैं और सफलता हासिल की है. उन्होंने कहा कि गुजरात सरकार के निर्णय से आज वहां पर लाखों महिलाओं के पास अपने नाम पर संपत्ति है, दूसरे राज्यों में यह आंकड़ा न के बराबर है.

मोदी ने कहा कि भारत की महिलाओं को लेकर पश्चिम की सोच को बदलना होगा. विकास यात्रा में महिलाओं को हिस्सेदार बनाना होगा. पश्चिम की इस सोच को बदलना होगा कि भारत की महिलाएं कामकाजी नहीं होती हैं. आदिवासी इलाकों में इकॉनमी में ड्राइविंग फोर्स वहां की महिलाएं हैं. निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी जितनी भागीदारी बढ़ेगी, उतनी उनकी ताकत बढ़ेगी.