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भुल्लर के पक्ष में उतरे मानवाधिकार संगठन

भुल्लर के पक्ष में उतरे मानवाधिकार संगठन

नई दिल्ली. 13 अप्रैल 2013

देवेंदर पाल सिंह भुल्लर


सुप्रीम कोर्ट द्वारा देवेन्दर पाल सिंह भुल्लर की फाँसी को आजीवन कारावास में बदलने की याचिका को खारिज किए जाने को मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने गलत बताया है. वहीं पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट ने ने भी इस फैसले की निंदा की है. पीयूडीआर ने कहा है कि इस याचिका की अस्वीकृति के साथ क्षमा, मृत्युदंड, पूर्व के निर्णयों और न्याय की हत्या जैसे कई सारे मुद्दे एक साथ जुड़े हुए हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक अपील जारी करते हुये राष्ट्रपति समेत भारत के दूसरे सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों से भुल्लर की फांसी की सजा को रद्द करने की मांग की है. वहीं दूसरी ओर पीयूडीआर ने कहा है कि न्यायशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित नहीं किया जा सकता है. भुल्लर पहले ही जेल में 12 साल गुजार चुका है फाँसी की सजा पाए कैदी को लम्बे समय तक फाँसी के इंतजार में रखना एक निर्मम एवं क्रूरतापूर्ण व्यवहार है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की अवहेलना करता है.

भुल्लर के मामले पर पीयूडीआर ने कहा है कि आदर्श रूप में न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी को देखने और उसके आधार पर राहत देने का एक मानक होना चाहिए. कुछ मामलों में हम देखते हैं कि दोषी को महज दो साल या ढ़ाई साल की देरी के आधार पर ही राहत दिया गया है. टी.वी. वथीस्वरण बनाम तमिलनाडू राज्य (1983) 2 एससीसी 68 और इदिगा अनम्मा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1974) 4 एससीसी 443 के मामलों में न्यायालय ने दो साल की देरी को ठीक माना लेकिन उससे अधिक की देरी होने पर फाँसी को उम्रकैद में बदलने की बात की.

पीयूडीआर ने कहा है कि भगवान बक्स सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1978) 1 एससीसी 214 के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने जहाँ ढ़ाई साल की देरी के आधार पर सजा को उम्रकैद में बदलने की बात की वहीं साधु सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य(1978) 4 एससीसी 428 के वाद में साढ़े तीन साल की देरी की स्थिति में सजा को उम्रकैद में बदलने की तरफदारी की. जबकि भुल्लर के मामले में सजा होने में 12 साल की देरी और राष्ट्रपति द्वारा निर्णय लेने में हुई 8 साल से ज्यादा की देरी के बावजूद न्यायालय ने कोई राहत नहीं दिया.

पीयूडीआर ने इस बात पर आश्चर्य जताया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने दया याचिका को खारिज करते समय भुल्लर की दिमागी हालत का भी खयाल नहीं रखा. दिमागी तौर पर बीमार किसी व्यक्ति को फाँसी देना मानवता के खिलाफ एक अपराध है. संगठन ने फांसी की सजा को ही समाप्त करने की भी बात कही है.