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लेखक संगठन प्रेमचंदकालीन नहीं -कमला प्रसाद

लेखक संगठन प्रेमचंदकालीन नहीं -कमला प्रसाद

 

रायपुर, 25 सितंबर 2009
प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव व वसुधा के संपादक कमला प्रसाद ने प्रगतिशील संगठनों से जुड़े साथियों को चेताया है कि आज के संक्रमणकाल में अगर अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अतिशुद्ध सिद्ध करने की कोशिश होगी तो सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खण्डित हो सकती है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रमोद वर्मा की स्मृति में उनके मित्र व राज्य के पुलिस महानिदेशक कवि विश्वरंजन के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम को लेकर प्रगतिशील खेमे का विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा है. इस आयोजन में शामिल लेखकों की प्रलेस और जलेस ने निंदा भी की है, वहीं कुछ सदस्यों को संगठन से बाहर भी किया है. इसके अलावा प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा फोर्ड फाउंडेशन के पैसे लेने को लेकर भी सवाल हुए हैं. इन्हीं विवादों के बीच पहल के संपादक व कथाकार ज्ञानरंजन ने भी प्रगतिशील लेखक संघ से इस्तीफा दे दिया है.

इन मुद्दों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव व वसुधा के संपादक कमला प्रसाद ने एक बयान में कहा है कि विगत कुछ दिनों प्रकाशित पत्रिकाओं-समाचार पत्रों के कुछ लेखों तथा हमारे सम्मानित लेखक ज्ञानरंजन की टिप्पणियों ने प्रलेस से संबंधित सांगठनिक स्तर पर कुछ सवाल पैदा किए हैं. प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बनती है कि उठाए गए सवालों के बारे में वस्तुस्थिति स्प‍ष्ट करूं. सवाल हैं कि प्रमोद वर्मा संस्थान द्वारा आयोजित ‘प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह’ में प्रलेस की भागीदारी क्यों हुई? प्रगतिशील वसुधा ने गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से फोर्ड फाउण्डेशन की राशि से प्रदत्त कबीर चेतना पुरस्कार चुपके-चुपके क्यों ले लिया?

अपने बयान में कमला प्रसाद ने स्पष्ट किया है कि प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में जलेस-प्रलेस और जसम के अलावा अन्य महत्वपूर्ण लेखकों को आमंत्रित किया गया था. संस्थान की ओर से भेजे गए पहले निमंत्रण पत्र में-वे नाम थे जिन्हें आमंत्रण भेजा गया था. दूसरे और आखिरी निमंत्रण पत्र में वे नाम थे-जिन्होंने आने की स्वीकृति दी थी. पूछने पर ज्ञात हुआ कि जिनकी स्वीकृति नहीं मिली उन्हें छोड़ दिया गया.

श्री प्रसाद के अनुसार प्रमोद वर्मा मार्क्सवादी और मुक्तिबोध, परसाई के साथी थे. वे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मण्डल में रहे हैं. छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही, इसलिए बहुत से लेखकों से उनके वैचारिक पारिवारिक रिश्ते थे. राज्य के वर्तमान पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन तब उसी क्षेत्र में पदस्थ होने के कारण प्रमोद जी की मित्र मण्डली में थे. प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान बना-तो उसमें रूचि से वे सहयोगी बने. छत्तीसगढ़ के अनेक लेखकों के साथ आजकल वे इसके अध्यक्ष हैं. निर्णय का अधिकार अकेले उन्हें ही नहीं है. पृष्ठभूमि के रूप में इसे जानना जरूरी है.

कमला प्रसाद के अनुसार जब इस कार्यक्रम की घोषणा हुई तो उन्होंने छत्तीसगढ़ प्रलेस के साथियों से पूछा कि क्या स्थिति है? छत्तीसगढ़ के साथियों ने सलाह दी कि प्रमोद वर्मा पर कार्यक्रम प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से है. सरकारी अनुदान नहीं है. इसलिए आना चाहिए. स्वीकृति देने वाले लेखकों में कमला प्रसाद ने अनेक वैचारिक साथियों और संगठनों में शामिल लेखकों के नाम देखे तो जाना तय किया. समारोह में आने वालों में छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण लेखकों के अलावा प्रमुख-खगेंद्र ठाकुर, अशोक वाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, शिवकुमार मिश्र, कृष्ण मोहन, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे नाम थे. कृष्ण मोहन और श्री भगवान सिंह को आलोचना पुरस्कारर भी दिया गया था. अच्छी बात यह हुई कि प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन हुआ.

प्रलेस महासचिव कमला प्रसाद ने अपने बयान में कहा है कि कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री और कुछ नेताओं के आने तथा विवादास्पद वक्तव्य देने पर आए लेखकों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई, जिसका आक्रामक उत्त‍र लोगों ने अपने-अपने वक्तव्यों में दिया. पूरे आयोजन में प्रमोद वर्मा की विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ बहस का आधार बनी रही. इसी दौरान कहीं से चर्चा में सुनाई पड़ा कि एक मित्र लेखक ने ‘पब्लिक एजेण्डा‘ में विश्वरंजन अर्थात डीजीपी छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के समर्थन और नक्सलपंथियों के विरोध में छपे इंटरव्यू को मुद्दा बनाकर कार्यक्रम में शामिल होना स्थगित किया है. उस समय तक लोगों ने ‘पब्लिक एजेण्डा’ का इंटरव्यू नहीं देखा था. इसके अलावा सीधे भाजपा शासित सरकारी कार्यक्रम न होने के कारण लोग आए थे. उन्हें पहले से पता था कि सलवा जुडुम भाजपा सरकार के एजेण्डे में है. आमंत्रित लेखकों ने प्रमोद वर्मा स्मृति के पूरे आयोजन को लेकर कुछ आपत्तियां दर्ज कराईं. संस्थान के साथियों को परामर्श दिया गया कि इसे हमेशा सत्ता के प्रमाण से अलग रखा जाए.

कमला प्रसाद ने अपने बयान में कहा है कि छत्तीसगढ़ के जलेस-प्रलेस के साथियों तथा वामपंथी राजनीतिक दलों ने लगातार सलवा जुडुम के मसले पर सरकार का विरोध किया है. डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई के लिए हुए आंदोलन में ये सभी लेखक शामिल रहे हैं. लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में यह प्रमुख मुद्दा था. याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं. मध्य‍प्रदेश में पिछले छह वर्षों में अल्पसंख्यकों पर सैंकड़ों अत्याचार और हत्याएं हुईं हैं. प्रलेस के लेखकों ने यहां लगातार सरकारी कार्यक्रमों का समय-समय पर विरोध और यथासमय बहिष्कार किया है. एक सूची प्रकाशित की जानी चाहिए कि मध्यप्रदेश में इन सारे प्रदेशों के सरकारी कार्यक्रमों में किनकी-किनकी कहां-कहां भागीदारी रही है. मैं नहीं मानता कि गैर सरकारी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शामिल होने मात्र से लेखकों का हत्यारों के पक्ष में खड़ा होना कहा जाएगा?

वसुधा के फोर्ड फाउण्डेशन की राशि से कबीर चेतना पुरस्कार लेने को लेकर आरोपों पर कमला प्रसाद ने अपने बयान में कहा है कि संस्थान से स्पष्ट जानकारी के बाद कि यह पुरस्कांर राशि संस्थान की ओर से है फोर्ड फाउण्डेशन की नहीं, संपादकों ने चुपके-चुपके नहीं एक समारोह में प्राप्त किया है. लोग जानते हैं कि गोविंद वल्लभ पंत सामजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का एक प्रभाग है. दलित संसाधन केंद्र उसकी एक इकाई है. दलित संसाधन केंद्र की ओर से विगत कई वर्षों से दलितों की स्थितियों पर अध्ययन होता रहा है. संस्थान ने दलितों के बारे में दस्तावेजीकरण के अलावा-इलाहाबाद तथा भोपाल जैसे अन्य शहरों में केंद्र की संगोष्ठियां की हैं. मुझे याद नहीं पड़ता कि हिंदी का कौन सा महत्व्पूर्ण लेखक है जो इन कार्यक्रमों में नहीं गया और मानदेय स्वीकार नहीं किया. जहां तक कबीर चेतना पुरस्कार की बात है-पहले हंस और तद्भव ने ये पुरस्कार लिए हैं. इनके संपादक भी संगठनों के हिस्सा हैं. प्रगतिशील वसुधा लगातार दलित साहित्य प्रकाशित करती रही है. एक विशेषांक भी प्रकाशित हुआ था, इसलिए निर्णायकों ने इस पत्रिका की पात्रता तय की है. प्रलेस से सीधी जुड़ी होने के कारण प्रगतिशील वसुधा का ऑडिटेड आय-व्यय खुले पन्नों में है. कभी भी देखा जा सकता है.

अपने बयान में कमला प्रसाद ने लेखक संगठनों को चेताया है कि आज की परिस्थितियों में जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियों का जाल देश में फैल रहा है, समूची मानवीय संस्कृति का बाजारीकरण हो रहा है, मूल्यों को तहस-नहस करने की साजिश है, उस समय अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अतिशुद्ध सिद्ध करने की कोशिश सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खण्डित करेगी. मर्यादाएं टूटने के बाद आंदोलन छूट जाएगा और लोग व्याक्तिगत हमलों पर उतर आएंगे.

श्री प्रसाद ने माना है कि अब लेखकों के संगठन प्रेमचंद कालीन नहीं हैं, हो भी नहीं सकते. पर आज की परिस्थितियों में जो संभव है-हो रहा है. जरूरत पड़ने पर इनका जुझारू रूप देखा जा सकता है. इनके बिना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर आवश्यक सामूहिक पहल की कल्‍पना असंभव होगी. विरोधी शक्तियां इन्हें तोड़ना चाहती हैं. कदाचित इनके विघटन की प्रक्रिया शुरू हो गई तो वह दिन खतरनाक होगा.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

अनिल जनविजय (aniljanvijay@gmail.com) ्मास्को, रूस

 
 मैं कमला प्रसाद जी की इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि "आज के संक्रमणकाल में अगर अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अतिशुद्ध सिद्ध करने की कोशिश होगी तो सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खण्डित हो सकती है।" दर‍असल ये गुटबाज़ी तभी पैदा होती है जब कुछ लेखक असंतुष्ट रह जाते हैं कि निजी रूप से उन्हें इसका लाभ क्यों नहीं मिला। बातचीत तो होनी ही चाहिए।

समारोहों, महोत्सवों और संगोष्ठियों में भी एक-दूसरे के यहाँ आना-जाना चाहिए। दुनिया किस तरफ़ जा रही है, इसका ध्यान रखते हुए ही प्रगतिशीलता के मापदण्ड तय किए जाने चाहिएँ। कुँए का मेंढ़क बनकर अपने कुँए के अलावा बाकी सब जलाशयों को 'जनविरोधी' और मानवद्रोही घोषित कर देना कहाँ की प्रगतिशीलता है?

फ़ोर्ड फ़ाउण्डेशन अगर आपके उद्देश्य में कोई बाधा न डालते हुए, बल्कि उसके समर्थन में आपके पक्ष में आता है तो इसे भी अपनी जीत ही माना जा सकता है? चीज़ों को ऊपरी ढंग से न देखकर उनकी गहराई में जाकर सोच-विचार करना ज़रूरी है। इस्तीफ़ा देने वाले साथियों को यह सोचना चाहिए कि वे कहीं अपने कामों से प्रगतिशील आन्दोलन को ही नुक्सान तो नहीं पहुँचा रहे हैं यानी जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को तो नहीं काट रहे हैं।
 
   

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