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मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था

मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था

नई दिल्ली. 3 मई 2013

जासूस


मोहनलाल भास्कर की आत्मकथा ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ एक ऐसी कृति है, जो रोंगटे खड़ी कर देती है. मोहनलाल भास्कर को लाहौर, कोट लखपत, मियाँवाली और मुलतान की जेलों में भोगना पड़ा. किसी तरह उनकी रिहाई हुई और भारत लौटने के बाद वे फिरोजपुर के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगे. कुछ साल पहले ही उनका निधन हो गया.

इस किताब से पता चलता है कि पाकिस्तान मे हमारे अनेक जासूस हैं और पाकिस्तान के तो भारत में और भी ज्यादा. दोनों देश गुप्त जानकारियाँ इकट्ठी करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं.

मोहनलाल भास्कर जाहिर तौर पर पाकिस्तान की आणविक योजनाओं के बारे में जानकारी इकट्ठी करने के अभियान पर थे. लेकिन बड़ी चतुराई के साथ वे इस किसाब में हमें यह नहीं बताते कि अपने लक्ष्य में उन्हें सफलता मिली या नहीं. उन्हें उनके अपने ही एक सहकर्मी, शायद दोहरे जासूस, ने धोखा दिया और वे दुश्मन के हाथों पड़ गए. वहाँ सेना और पुलिस के अधिकारियों ने उनसे जो पूछताछ की, उसमें अकल्पनीय रूप से भयकर यातनाएँ भी शामिल है. उनके कई साथी पागल हो गए और कई ने अपनी जान दे दी. भास्कर ने उनका वर्णन इतने विशद रूप से किया है कि पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं तथा रीढ़ की हड्डी सुन्न होने लगती है.

किताब में डाकुओं, वेश्याओं, उनके दलालों और तस्करों के साथ जो उन्हीं जेलों में होते थे, बिताए गए कुछ हल्के-फुल्के क्षणों का चित्रण भी है. पाकिस्तान में उनका अधिकांश कार्यकाल जनरल याह्या खाँ के शासन के दौरान था. उन्होंने भुट्टो को जेल में भी देखा और भुट्टो को पाकिस्तान के प्रधान मंत्री के रूप मे भी देखा. उन्होंने याह्या की प्रेमिका ‘जनरल’ रानी के बारे में सुना कि वह सर्वाधिक शाक्तिसंपन्न महिला है और फिर देखा कि उसे उनकी ही जेल के महिला विभाग में धकेल दिया गया है.

मोहनलाल भास्कर मियाँवाली गईजो में थे. जब शेख मुजीबुर्रहमान को वहाँ लाया गया और उनकी कब्र खुदवाई गई जो बाद में भुट्टो द्वारा उन्हें रिहा कर दिए जाने पर पाट दी गई थी और शेख विजयी बंगला देश लौटे थे. अपनी जेल की कोठरी से भास्कर ने देखा कि कैसे भारतीय बमवर्षकों और युद्धक विमानों ने पाकिस्तान की वायुसेना को परास्त किया. उन्हें चौदह वर्ष जेल में बिताने थे-शायद उन्हें जीवित भारत द्वारा गिरफ्तार किए गए पाकिस्तान जासूसों के साथ विनिमय होना था.

यहां पेश है राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित मोहनलाल भास्कर की उस किताब का एक अंश-
मैं कोट लखपत जेल पाकिस्तान लाहौर की सजा-ए-मौत की कोठरी में कैद हूँ. 24-5-71 की सुबह एक नंबरदार ने आकर मुझसे कहा कि निकलो, तुम्हें ड्योढ़ी में बुलाया गया है. एक फौजी अफसर तुम्हारा फैसला सुनाने आया है. मैं उसके साथ जेल की ड्योढ़ी में पहुँचता हूँ. मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा है. वह मुझे मेजर अशफ़ाक़ के सामने लाकर खड़ा कर देता है, जो मेरे फील्ड जेनरल कोर्ट मार्शल में सरकारी वकील था. उसने फैसला सुनाया, ‘मिस्टर मोहनलाल भास्कर उर्फ मुहम्मद असलम, फौजी अदालत तुम्हें पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी के इलजाम में 14 साल कैद बामशक्कत की सजा देती है.’

यह सुनते ही मैं खुशी से पागल हो गया, क्योंकि सजा-ए-मौत से बच गया, जो समरी कोर्ट मार्शल में मेरे लिए रिकमेंड की गई थी. मैं दौड़ता हुआ बैरक में आया. औरों ने समझा कि मैं बरी हो गया हूँ. बोले ‘क्या हुआ ?’ मैंने कहा राय बनबास.’ यह कहकर मैं अपनी कोठरी में आ गया और सोचने लगा उस लंबे सफर के बारे में, जिसे मैं तय कर चुका था और उसके बारे में, जिसे अभी तय करना था. उस एकांत कोठरी में अतीत की परछाइयाँ धीरे-धीरे मन पर उतरने लगती हैं.

अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान में क्या हो रहा है, इस जिज्ञासा को शांत करने को मन न जाने कब से व्याकुल था और मैं कोई साधन ढ़ूँढ़ रहा था. फिर सितंबर 65 की जंग ने तो मेरी इस जिज्ञासा को और भड़का दिया. 14 नवंबर, ’65 के धर्मयुग’ में मेरा एक लेख छपा था, फिरोजपुर का आँखों देखा मोर्चा.’ फिर उसके बाद जब भगतसिंह की समाधि पर 23 मार्च का मेला लगा, तो वहाँ मंच पर मैंने यह पंक्तियाँ पढ़ी थी, भगतसिंह को संबोधित करते हुए-

तेरे लहू से सींचा है अनाज हमने खाया.
यह जज्बा-ए-शहादत है उसी से हममें आया.’

(स्मरण रहे कि 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह को लाहौर जेल में फाँसी देने के बाद, जब सतलज के किनारे उनकी लाश के टुकड़े किए जा रहे थे, पीछे-पीछे लोग पहुँच गए और मजबूरन अंग्रेजों को लाश जलानी पड़ी).

इन पंक्तियों पर लोगों ने बहुत वाह-वाह की. जब मैं मंच से उतरा तो एक अधिकारी-सा लगनेवाला व्यक्ति मेरे पास आया और बोला, ‘भास्कर साहब देश के लिए कविताएँ पढ़ना बहुत सरल है, मरना बहुत कठिन. क्या वाकई आपसे भगतसिंहवाला पढ़ना बहुत सरल है. मरना बहुत कठिन. क्या वाकई आपसे भगतसिंहवाला जवान शहादत भाव हैं ?’

यह सुनते ही मैं जलाल में आ गया और बोला, “साहब जब कभी सीमा पर गोली चले तो बुला लेना. आपसे चार कदम आगे चलूँगा और पीछे भागने लगूँ तो गोली मार देना या देश के लिए कहीं भी आपकी मेरी जरूरत पड़े तो यह जिम्मों-जाँ हाजिर हैं.”

वह साहब कौन थे, मुझे किसने इस राह पर प्रेरित किया और मैंने क्या-क्या किया, इसका जिक्र करना देश के हित मे नहीं हैं. गुप्तचर का जीवन इतना एकाकी तथा आत्मकेंद्रित होता है कि वह अपने भेदों की दुनिया में अपने प्रियजन को भी झाँकने नहीं देता. मैं सुन्नत करवाकर मुसलमान बन चुका हूँ यह बात मेरे माता-पिता तो दूर पत्नी तक को पता न थी. न वे यह जानते ते कि मैं क्या करता हूँ, कहाँ जाता हूँ.

सीमा की ओर कभी आप नजर उठाकर देखें तो साँय-साँय करता अँधेरा ही अँधेरा नजर आएगा. पता नहीं मौत कहाँ, किस रूप में छिपी बैठी रहती है. साँप या बिच्छु काट भी ले, तो भी चीख नहीं सकते वरना दुश्मन गोली मार देगा. कहीं जंगली सुअर दनदना रहे हैं, तो कहीं गीदड़ हुआँक रहे हैं. पीछा करते हैं. गोश्त पर पले गुए खूँखार कुत्ते और इनसे दो-चार होता है जासूस बेमरोसामान दस करोड़ दुश्मनों की बीस करोड़ आँखों से खुद को बचाए हुए अपनी आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए हुए ताकि कोई उसकी आँखों में उसकी भावनाओं का भाँप न ले. अजनबी लोगों में, अजनबी शहरों में विचरता है. सौ तरह के स्वाँग भरता है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

updesh rajput [updeshrajput8@gmail.com] muzaffar nagar - 2015-08-12 19:11:53

 
  मेरा शत शत नमन है उन शेरो को जो अपनी जान ओर सारी इचछाएँ तयागकर निस्वार्थ भाव से मेरे देश वासियो की सेवा करते हैँ और यहाँ मै ये भी कहना चाहूँगा के येँ ही सच्ची सेवा और सर्विस है जय हिँद जय भारत 
   
 

sonumisra [sonumisra2001@email.com] surat se - 2013-05-04 05:58:49

 
  राष्ट्र के लिए जान देने या कठिन यातनाएं सहने से कौन घबराता है. दुख इस बत का है कि जब तक हम अगले देश की खूफिया खबरें अपने देश को देते रहते हैं तब तक हमें वाहवाही मिलती है. और जब हम पकड़े जाते हैं तो हमें सरकार के साथ साथ हमारी खूफिया एजेंसी भी हमें भूल जाती है और हम न इधर के होते हैं न उधर के. 
   
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