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सेक्स का घनचक्कर

सेक्स का घनचक्कर

मुंबई. 28 जून 2013

विद्या बालन


विद्या बालन की फिल्म घनचक्कर देखने के बाद आपकी यह राय और मजबूत हो जाएगी कि किसी अच्छे निर्देशक की हरेक फिल्म अच्छी नहीं हो सकती. उसे दूसरे दर्जे की मूर्खतापूर्ण फिल्म भी करने का हक है. वैसे भी पिछले कुछ सालों में ऐसी कई फिल्में परदे पर आई हैं, जिनमें अक्ल के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया गया है. लेकिन किसी फिल्म को अपनी धारणा मजबूत करने के लिये नहीं देखा जा सकता और ना ही अक्ल को प्रतिबंधित करने को उद्देश्य बना कर. लेकिन नो वन किल्ड और आमिर जैसी फिल्म बनाने वाले राजकुमार गुप्ता जब कुछ नया करने की कोशिश में यह सब कुछ कर गुजरते हैं तो थोड़ा आश्चर्य होता है.

फिल्म के निर्देशक राजकुमार गुप्ता का दावा था कि विद्या बालन और इमरान हाशमी की यह फिल्म पूरे परिवार के साथ देखी जा सकती है और यह भी कि फिल्म में भरपूर कॉमेडी है. लेकिन फिल्म को देखते हुये यह बात साफ समझ में आती है कि फिल्म में ऐसा तो कुछ है ही नहीं और यह बात निर्देशक को भी समझ में आती है. यही कारण है कि इस पूरी फिल्म में निर्देशक ने ठूंस-ठूंस कर सेक्स को भरा है. फिल्म की कहानी अच्छी थी लेकिन स्क्रीनप्ले इतना कमजोर रहा है कि फिल्म देखना मुश्किल हो जाता है. यह फिल्म एक अच्छी कहानी के साथ खराब फिल्म का भी अच्छा उदाहरण है.

फिल्म की कहानी कुल जमा ये है कि इमरान हाशमी और उसके दो साथी एक बैंक से 35 करोड़ चुराते हैं और तय होता है कि तीन महीने बाद पैसों की बंटवारा किया जाएगा. लेकिन इस बीच इमरान हाशमी की याद्दाश्त चली जाती है. इसी मुद्दे को लेकर पूरी फिल्म चलती रहती है. चलती रहती है कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि असली बात तो ये है कि पूरे समय फिल्म घिसटती रहती है और इसी तरह घिसटती-घिसटती खत्म हो जाती है. इंटरवल तक तो फिल्म थोड़ी मनोरंजक लग सकती है लेकिन इसके बाद फिल्म में कई दर्शक खर्राटा लेते नजर आ सकते हैं. ऐसे में फिल्म को देखने का निर्णय आप ले सकते हैं. वैसे सब्र का इम्तेहान लेने के लिये आप चाहें तो सिनेमाघर का रुख कर सकते हैं.