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बटला हाउस एनकाउंटर फर्जी नहीं: अदालत

बटला हाउस एनकाउंटर फर्जी नहीं: अदालत

नई दिल्ली. 25 जुलाई 2013. बीबीसी

batla house encounter


बहुचर्चित बटला हाउस मुठभेड़ मामले में अदालत ने शहज़ाद अहमद को दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या का दोषी क़रार दिया है. अदालत अब 29 जुलाई को शहज़ाद की सज़ा पर फ़ैसला सुनाएगी. न्यायाधीश राजेन्द्र कुमार शास्त्री की अदालत ने बटला हाउस मुठभेड़ को सही ठहराया है.

अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए शहज़ाद की वकील ने कहा कि "हम इस फैसले को स्वीकार नहीं करते हैं और हम लोग हाईकोर्ट में अपनी लड़ाई आगे जारी रखेंगे. हम पूरी घटना की न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे, जिसे नहीं माना गया है. आखिर सरकार न्यायिक जाँच से क्यों डरती है."

दिल्ली पुलिस ने 19 सितंबर 2008 को जामिया नगर स्थित बटला हाउस इलाके में हुई मुठभेड़ में कथित तौर पर इंडियन मुजाहिदीन के दो चरमपंथियों को मारने का दावा किया. इस दौरान दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा भी बुरी तरह घायल हो गए थे और बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी. इस मुठभेड़ पर कई सवाल भी उठे थे.

दिल्ली पुलिस के आरोप पत्र के मुताबिक़ शहज़ाद अहमद और उनके साथियों ने 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों की साज़िश रची थी. इन विस्फोटों में 30 लोग मारे गए थे. पुलिस का दावा था कि ये पूरी साज़िश बटला हाउस के मकान नंबर एल-18 में रची गई थी. इसके बाद कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि यह मुठभेड़ फर्जी थी, जिसके बाद पूरे मसले पर राजनीति गर्मा गई. 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने आज़मगढ़ पहुंचकर इस मुठभेड़ में मारे गए लोगों को न्याय दिलाने का वादा किया था.

दिल्ली पुलिस का कहना था कि मुठभेड़ के दौरान दो कथित चरमपंथी भागने में सफल रहे थे जिनमें से एक शहज़ाद को बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते ने गिरफ़्तार किया था.

इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा और उनकी टीम को गुप्त सूचना मिली थी कि आईएम के कुछ सदस्य जामिया नगर में छिपे हैं. मुठभेड़ के दौरान उन्हें चार गोलियां लगी थीं और उनकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी. शहज़ाद पर दिल्ली पुलिस की टीम पर गोली चलाने और इंस्पेक्टर शर्मा की हत्या का आरोप लगाया गया. सुनवाई के दौरान शहज़ाद ने इन आरोपों से इनकार किया.

समाजवादी पार्टी ने भी मामले की न्यायिक जाँच कराने की माँग की थी. साल 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इस मामले की जाँच करने के आदेश दिए थे. दो महीने बाद जुलाई 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुठभेड़ असली थी और पुलिस की कार्रवाई नियमों के मुताबिक़ थी.

तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दिग्विजय के दावों को ख़ारिज कर दिया था. कुछ मुसलमान सांसदों ने मामले की जाँच की माँग की थी जिस पर चिदंबरम ने कहा था कि मुठभेड़ असली थी. उन्होंने साथ ही कहा था कि मामले की दोबारा जाँच की कोई ज़रूरत नहीं है.

अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि उसके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि शहज़ाद मुठभेड़ के समय फ़्लैट में मौजूद थे और उन्होंने पुलिस पर गोली चलाने के बाद बालकनी से छलाँग लगा दी थी.

दूसरी ओर बचाव पक्ष ने दिल्ली पुलिस के दावे पर कई सवाल उठाए थे. उसकी दलील है कि बैलिस्टिक रिपोर्ट के मुताबिक़ शर्मा के शरीर से निकली गोलियां घटनास्थल से मिली गन से मेल खाती हैं न कि शहज़ाद से मिली गन से. साथ ही इस बात पर भी सवाल उठे हैं कि शर्मा ने बुलैटप्रूफ़ जैकेट क्यों नहीं पहना था और उनके दो साथी निहत्थे क्यों थे?


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