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बीए पास में सब पास

बीए पास में सब पास

मुंबई. 5 अगस्त 2013

बीए पास


पुरुष वेश्यावृत्ति को लेकर बनाई गई ‘बीए पास’ फिल्म में अगर आप कुछ खास कथानक तलाशने की कोशिश करते हुये सिनेमाघर में दाखिल होते हैं तो यह आपकी गलती होगी. हां, एक पुराने और अपराध कथाओं में बेहद लोकप्रिय पुरुष वेश्यावृत्ति को लेकर यह फिल्म बनाई गई है और ऐसे विषयों में आपकी दिलचस्पी है तो यह फिल्म आपको जरुर अच्छी लगेगी. वैसे भी पुरानी कहानी होने के बाद भी फिल्म अंत तक दर्शक को बांध कर रखती है.

फिल्म की कुल जमा कहानी इतनी भर है कि अपने मां-बाप की मौत के बाद अपनी बुआ के पास दिल्ली पहुंचे मुकेश यानी शादाब कमाल को उसकी बुआ और बहन हमेशा उसकी बेरोजगारी के लिये ताने मारते हैं. मुकेश की दो बहने हास्टल में रहती हैं और उनका जिम्मा भी मुकेश पर है. इसबीच मुकेश की मुलाकात सारिका यानी शिल्पा शुक्ला से होती है, जो उसकी बुआ की दोस्त है.

सारिका के साथ उसके देह के रिश्ते बनते हैं और फिर सारिका उसे अपनी ऐसी महिला दोस्तों के पास भी भेजती है, जो देह संबंधों में अपने पतियों से असंतुष्ट हैं. इस बीच सारिका की सास अपने बेटे को इस संबंध का इशारा करती है. आगे की कहानी के लिये आपको फिल्म देखना चाहिये.

वैसे भी पूरी फिल्म अपने ट्रीटमेंट की वजह से देखने लायक है. हां अंतरंग दृश्यों की भरमार कई बार खिज पैदा कर सकती है और थोपी हुई भी लगती है.

फिल्म की कहानी मोहन सिक्का की है, जिसका शीर्षक ‘रेलवे आंटी’ था. हालांकि साहित्य के पाठकों को भरत शाह की फिल्म ‘बीए पास’ देखते हुये अगर सुरेंद्र वर्मा की याद आ जाये तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा. ‘मुझे चांद चाहिये’ उपन्यास लिखने वाले सुरेंद्र वर्मा को चांद मिल गया था लेकिन इसके बाद ‘दो मुर्दों के लिये गुलदस्ता’ लिख कर वे झटपट मुंह के बल गिर पड़े थे. लेकिन बीए पास एक फिल्म के बतौर तो देखने लायक है. खास तौर पर बेहत सुंदर तरीके से लिखी गई पटकथा और शिल्पा शुक्ला के अभिनय के लिये तो यह फिल्म देखी ही जा सकती है.


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