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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर विवाद

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर विवाद

जयपुर. 18 जनवरी 2014

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल


जयपुर में चल रहे साहित्य सम्मेलन को लेकर विवाद शुरु हो गया है. भारत में ग्रामीण इलाकों में खुली लूट चलाने वाली कंपनियां इस आयोजन की प्रायोजक हैं और आपत्ति इस बात को लेकर भी है.

भोर पत्रिका के रंजीत वर्मा और अंजनी कुमार ने आरोप लगाया है कि जयपुर साहित्य महोत्सव का सारा खेल प्रायोजक का है, जिसके पीछे उसकी अपनी सोची-समझी राजनीति है. लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि जो लेखक वहां जाते हैं वे उनकी राजनीति का शिकार होते हैं क्योंकि इनमें से कई लेखकों के लेखन का आधार वही राजनीति होती है. ऐसे लेखक साहित्य में खुद को सही सिद्ध करने के लिए कॉर्पोरेट ताकत का सहारा लेने वहां जाते हैं, जबकि जो कॉर्पोरेट ताकतें हैं वे विरोध के एकमात्र क्षेत्र साहित्य को अपने अनुकूल करना चाहती हैं, साथ ही अपनी छवि मानवीय और खुद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रहरी के तौर पर स्थापित करना चाहती हैं.

रंजीत वर्मा और अंजनी कुमार ने अपने बयान में कहा है कि ये कॉर्पोरेट ताकतें खुद को सही भी साबित करना चाहती हैं क्योंकि उनकी ताकत जिस पूंजी पर टिकी होती है उसका बहुत बड़ा भाग वे लूट, हत्या और दलाली से पैदा करती हैं. उनका तर्क होता है कि जिसका कहीं कोई विरोध नहीं होता वह सही होता है. इसलिए वे तमाम तरह के विरोध को या तो खरीदने की कोशिश करती हैं या उसे हमेशा के लिए खत्म कर देने की.

बयान में कहा गया है कि बहुत दिनों से जबकि एक ओर लोग इस बात को लेकर परेशान थे कि हिंदी साहित्य में आखिर कोई भी बड़ा साहित्यकार ऐक्टिविस्ट क्यों नहीं हुआ, वहीं दूसरी ओर कॉर्पोरेट ताकतें इस कमजोरी को सेंध लगाने के एक तैयार मौके के रूप में देख रही थीं. आज जो यह जयपुर साहित्य महोत्सव इतना विशाल दिख रहा है, उसके पीछे ऐसे आरामतलब साहित्यकारों की एक पूरी फौज का खड़ा हो जाना है जो नवमध्यवर्ग से आए हैं. यह नवमध्यवर्ग भूमंडलीकरण की देन है, और यह भूमंडलीकरण कॉर्पोरेट ताकतों की मानसिक उपज है जिसे दुनिया भर के शासक सच साबित करने पर न सिर्फ खुद तुले हैं बल्कि उन्हें भी उसने छूट दे रखी है कि वे अपनी ताकत भी अपनी इस मानसिक उपज को सच साबित करने में लगाएं.

बयान में आरोप लगाया गया है कि इन सबका एकमात्र मतलब अपनी लूट को बेरोकटोक बनाए रखना है, इसलिए वे तमाम सोचने वाले दिमागों को अपनी सोच के अनुकूल बनाना चाहते हैं. ये तमाम बड़े कार्यक्रम किए ही इसलिए जाते हैं ताकि ऐसे विरोधियों को हाशिये पर फेंका जा सके, ठीक उसी तरह जैसे ये किसानों को फेंक देते हैं जब गांव के गांव हथियाने निकलते हैं; ठीक उसी तरह जैसे आदिवासियों को धकिया देते हैं जब जंगल के जंगल अपने कब्जे में करने का नक्शा कागज़ पर तैयार करते हैं.

कार्पोरेट घरानों पर आरोप लगाया गया है कि साहित्य का असल मकसद क्या है, उसे वे तय करना चाहते हैं जिसे वे स्वान्तः सुखाय से शुरू करते हैं. वे कई बार अपने यहां विरोध के स्वर को भी उठने देते हैं ताकि विरोधियों को लगे कि वह एक खुला मंच है और वे वहां जाने में कोई पाप न देखें. लेकिन यह मुआवज़े से ज्यादा कुछ नहीं होता है. जैसे वे किसानों को देते हैं, आदिवासियों को देते हैं, ठीक उसी तरह वे विरोधी विचारों को भी मुआवज़ा देने में कोई गुरेज़ नहीं करते. इस तरह वे विरोधी विचार को एक तरह से खरीद लेते हैं और उसकी धार को कुंद कर देते हैं. मुआवज़ा लेने के बाद जिस तरह किसान या आदिवासी अपनी ज़मीन या जंगल की लड़ाई जारी रखने का नैतिक अधिकार खो देता है, उसी तरह लेखक भी अपने विचार की लड़ाई फिर नहीं लड़ पाता.

भोर पत्रिका की ओर से जारी बयान में ऐसे किसी भी महोत्सव, समारोहों या आयोजनों की भर्त्साना करते हुये तमाम साहित्यकारों से अपील की गई है कि वह जयपुर साहित्य महोत्सव का बहिष्कार करें और अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करें.


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