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अमित और आजम का क्या होगा

अमित और आजम का क्या होगा

लखनऊ. 12 अप्रैल 2014

आजम खान


उत्तर प्रदेश में आजम खान और अमित शाह पर चुनाव आयोग की रोक के बाद सपा और भाजपा के सामने बड़ा संकट पैदा हो गया है. राज्य में चुनाव की कमान संभालने वाले दोनों ही पार्टियों के नेता समझ नहीं पा रहे हैं कि इनका विकल्प क्या तलाशा जाये. मुलायम और अखिलेश की नाक के बाल आजम खान और नरेंद्र मोदी की नाक के बाद अमित शाह का विकल्प ढूंढे नहीं मिल रहे.

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान और भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह की उत्तर प्रदेश में होने वाली रैली, जनसभा और रोड शो पर रोक लगा दी है. इन दोनों नेताओं पर आरोप है कि इन्होंने भड़ाकाने वाले भाषण दिये हैं. इनकी चुनाव आयोग से शिकायत की गई थी. इसके बाद चुनाव आयोग ने मामले की जांच की और इन दोनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

दंगों के आरोप में जेल जा चुके भाजपा नेता अमित शाह ने मुजफ्फरनगर की एक सभा में कहा था अगर जाटों के अपमान का बदला लेना है तो भाजपा नेता और पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को वोट करो. शाह ने कहा था आदमी बिना भोजन और नींद के जिंदा रह सकता है. यहां तक कि भूख और प्यास के साथ भी जिंदा रहा जा सकता है. लेकिन, अपमान सहकर कोई नहीं रह सकता. अपमान का बदला तो लेना पड़ेगा.

कुछ इसी तरह के बयान सपा नेता आजम खान के थे. उन्होंने अपने कई भाषणों में मुसलमानों को कथित रुप से भड़काने वाली बातें कही थीं. उन्होंने बदला लेने का भी आह्वान किया था. उन्होंने नरेंद्र मोदी पर जुबानी हमला बोलते हुये कहा था कि देश को एक कातिल के हाथ में नहीं सौंपना है. आजम खान ने कहा था कि बटन दबाकर मुजफ्फरनगर का बदला लेना है.

हालांकि आजम खान की समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग से कहा है कि आयोग को फिर से विचार करना चाहिये. सपा ने आजम खान को धर्मनिरपेक्ष और अमित शाह को सांप्रदायिक बताते हुये अपना पक्ष रखा है. दूसरी ओर आजम खान ने कहा है कि मैंने सच से अलग कुछ भी नहीं कहा. मैंने किसी को धमकी नहीं दी है. मैं किसी को धमकी देने की स्थिति में नहीं हूं और यह सही भी नहीं है. आजम खान ने यह मानने से इंकार कर दिया कि उन्होंने कोई गलत बयान दिया है.

दूसरी ओर अमित शाह ने भी अपने बयान पर कहा है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है. हालांकि अमित शाह ने अपने बयान को लेकर कथित पुलिस रिपोर्ट से बचने के लिये हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी लेकिन चुनाव आयोग के रुख के बाद उन्होंने हाईकोर्ट से बैरंग वापसी ही मुनासिब समझा.

हालांकि माना जा रहा है कि दोनों ही पार्टियां अपना पक्ष मजबूत करने के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाएंगी. जनता के बीच खराब संदेश न जाये, इसलिये अदालत का फैसला भले चुनाव के बाद आये, दोनों ही पार्टियां अपने को सही साबित करने की जी तोड़ कोशिश करेंगी.


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