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तबाही का दंश झेल रहा है उत्तराखंड

तबाही का दंश झेल रहा है उत्तराखंड

देहरादून. 16 जून 2014.

kedarnath floods


विनाशकारी प्रलय के एक साल बाद भी उत्तराखंड का केदारनाथ इलाका तबाही के दंश को झेलने के लिए मजबूर है. त्रासदी में उजड़े सैकड़ों ग्रामीणों-शहरी लोगों के जीवन में साल भर बाद भी कोई राहत नहीं है. हादसे से पूरी तरह से चरमराई परिवाहन व्यवस्था को अभी तक बहाल नहीं किया जा सका है और अभी भी जगह-जगह से नरकंकालों का मिलना जारी है.

हालात ये हैं समय ने त्रासदी में उजड़े लोगों का दर्द और बढ़ा दिया है और 'भगवान की अपनी धरती' कहे जाने वाले इस पहाड़ी राज्य में कोई बुनियादी बदलाव नहीं होने से लोगों का संताप बढ़ता चला जा रहा है.

एक ऐसे समय में जब राज्य सरकार को बुनियादी सुविधाएं बहाल करने पर ध्यान देना चाहिए था सरकार ने भी पूरा ध्यान पैदल मार्ग तैयार कर केदारनाथ यात्रा फिर शुरु कराने पर ही रहा है. हादसे से प्रभावित इलाके में बुनियादी ढांचा गड़बड़ाया हुआ है लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते अब तक सतह पर कुछ बदलाव नहीं दिख रहा है.

गौरतलब है कि पिछले वर्ष 16 जून को बादलों ने जो तबाही मचाई थी उससे उत्तराखंड के कई गांव तबाह हो गए थे. लोगों को रोजी रोजगार से महरूम होना पड़ा. तीर्थयात्रा का समय होने के कारण देश भर से हजारों लोग वहां जमा थे और बादल फटने और भारी बारिश के बाद उफनी नदियों, भूस्खलन ने हजारों लोगों की जान ले ली.

इस त्रासदी की सबसे दर्दनाक घटना मशहूर केदार मठ के ठीक पीछे एक ग्लेशियर का पिघल जाना रहा जिससे व्यापक जन हानि हुई. चार धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के मार्ग में फंसे हजारों यात्रियों को सुरक्षित निकालने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी.

इसके बाद सरकार ने सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में ढेर सारे उपाय, पर्यावरण के साथ छेड़खानी रोकने का वादा किया था, लेकिन स्थानीय लोगों की तकलीफों में कोई बदलाव नहीं आया है.


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