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पढ़ाई पर अब सबका हक

पढ़ाई पर अब सबका हक

नई दिल्ली. 1 अप्रैल 2010


एक अप्रेल से 6 से 14 साल तक के बच्चों को अनिवार्य व मुफ्त शिक्षा का अधिकार देने वाले शिक्षा का अधिकार कानून से गरीब बच्चों का महंगे निजी स्कूलों में पढ़ने का सपना साकार होगा. अब स्कूलों में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ेगी. इस कानून को 8.1 करोड़ बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाने के लिए बनाया गया है.

इस कानून के तहत व्यवस्था है कि मान्यता प्राप्त हर निजी स्कूल में गरीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित होंगी. ये बच्चे निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा हासिल कर सकेंगे. इन बच्चों की शिक्षा पर जो खर्च आएगा, उसे सरकार उठाएगी. यानी सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे पर जितना खर्च आता है, उतना ही खर्च सरकार निजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे पर भी करेगी.

उम्मीद जताई जा रही है कि पिछले वर्ष संसद द्वारा पारित इस कानून के लागू होने के 6 से 14 वर्ष की उम्र वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराने संबंधी निर्धारित 10 उद्देश्य हासिल हो पाएंगे. मसलन इसमें शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक दायित्व, निजी स्कूलों में आरक्षण और स्कूलों में बच्चों के प्रवेश को नौकरशाही से मुक्त कराना शामिल है. बीच में स्कूल छोडने वाले बच्चें या स्कूल नहीं जाने वाले छह साल से अधिक आयु के बच्चों की स्कूल प्रबधंन समिति या स्थानी प्राधिकरण पहचान करेंगे और विशेष प्रशिक्षण देने के बाद उम्र के अनुसार उनका उचित कक्षाओं में प्रवेश दिलाएंगे.

इस कानून को लागू करने के लिए वित्त आयोग ने राज्यों को 25,000 करोड रूपए की सहायता दी है. वहीं अगले पांच साल में 1.71 करोड रूपए की आवश्यकता पडेगी.

दूसरी ओर कुछ विद्यालयों द्वारा असंवैधानिक और निजी शिक्षण संस्थानों के मूल अधिकारों का हनन करने वाला कहते हुए इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे चुके हैं. वहीं, मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि कानूनी प्रक्रिया इस कानून को लागू करने की राह के बीच में नहीं आएगी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunderlohia (lohiasunder2@gmail.com) Mandi{H.P]

 
 मान्यता प्राप्त प्राईवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के दाखिले के मामला पेचिदा है. इस वर्ग के बच्चे दाखिला हो जाने के बाद भी बड़े वर्ग के घमंडी बच्चों के सामने दब्बू हो जाएंगे. या तो स्कूल प्रबंधन इन बच्चों की पढाई के समय रहने, खाने, जेबखर्च की जिम्मेवारी उठाये और इस बात की गारंटी ले कि दाखिला लेने वाला बच्चा किसी भी हालत में स्कूल छोड़ कर न जाये. जाहिर है, इतनी सारी शर्तें वो लोग नहीं मानने वाले, जो अभी से इस लोकहितकारी कानून के खिलाफ कचहरियों का दरवाजा खटखटा रहे हैं. इसलिये बेहतर होगा कि इन प्राईवेट स्कूलों के प्रबंधन से जितनी फीस वगैरह वे लोगों से वसूलते हैं, उसका 25 प्रतिशत सरकारी खजाने में जमा करवा लिया जाये. इस जमा धन का इस्तेमाल सरकार दूर-दराज के सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने में किया जा सकता है. 
   
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