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समलैंगिक सेक्स पर अपील क्यों नहीं

समलैंगिक सेक्स पर अपील क्यों नहीं

नई दिल्ली. 1 अप्रैल 2010


सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सेक्स जैसे सार्वजनिक महत्व के विषयों के बजाय छोटे-मोटे मामलों में अपील दायर करने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई है.

रेलवे के एक कर्मचारी आर बर्डी के वेतन वृद्धि को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए बेंच ने अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल पीपी मल्होत्रा से कहा, ‘क्या भारत सरकार इसी तरह व्यवहार करती है? यदि एक रिटायर्ड कर्मचारी को वेतनवृद्धि का निर्देश दिया गया है तो इसमें आपको क्या समस्या है? क्या आपको इस मामले में सुप्रीम कोर्ट आना चाहिए? समलैंगिक सेक्स जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर आप अपील दायर नहीं करते ?’

भारतीय रेल में अकाउन्टेंट के तौर पर काम करने वाले आर बर्डी 31 दिसंबर 1989 को सेवानिवृत्त हुए और 13 साल बाद उन्होंने पेंशन में वृद्धि की मांग को लेकर कैट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने इस आधार पर पेंशन वृद्धि की मांग की कि उन्हें एक वार्षिक वेतन वृद्धि नहीं दी गई. जिसके खिलाफ केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी.

जस्टिस एके पटनायक ने बेंच की ओर से कहा, ‘यह अदालत संविधान के महत्वपूर्ण सवालों तथा मौलिक अधिकारों पर फैसला करने के लिए है। आप महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपीलें दायर नहीं करते। आप समलैंगिक सेक्स के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील नहीं करते, लेकिन छोटे-मोटे मामले लेकर आ जाते हैं।’

ज्ञात रहे कि पिछले साल 2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने दो वयस्क समलैंगिकों के बीच आपसी रजामंदी से यौन संबंध बनाने को अपराध घोषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 15 का उल्लंघन करने वाला बताया था. जिसको लेकर समाजसेवी संगठनों के विरोध के बाद भी केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में फैसले का विरोध नहीं करने का रुख अपनाया था.

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