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सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण खत्म किया

सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण खत्म किया

नई दिल्ली. 17 मार्च 2015
 

सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत जाटों को भी आरक्षण देने की घोषणा की अधिसूचना को निरस्त कर दिया.

यूपीए सरकार ने लोकसभा चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होने से एक दिन पहले चार मार्च, 2014 को यह अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत नौ राज्यों में जाटों को भी ओबीसी के तहत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था. तत्कालीन संप्रग सकार ने इस मामले में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसा की अनदेखी करते हुए इसके उलट यह अधिसूचना जारी की थी.

न्यायालय ने हालांकि, मंगलवार को संप्रग सरकार की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया. न्यायमूर्ति गोगोई ने आदेश पारित करते हुए कहा, "जाट जैसे राजनीतिक रूप से संगठित वर्ग को आरक्षण के हकदारों की श्रेणी में शामिल करने की पुष्टि नहीं की जा सकती."

तृतीय लिंग को पिछड़ा वर्ग के रूप में शामिल करने का जिक्र करते हुए न्यायालय ने कहा, "सिर्फ जाति ही आरक्षण का आधार नहीं हो सकता. हमें समसामयिक मानदंडों की ओर बढ़ना होगा."

न्यायालय का मंगलवार का आदेश जाटों को ओबीसी में शामिल करने के पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया. याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि चार मार्च की अधिसूचना का उद्देश्य लोकसभा चुनाव में लाभ लेना और इस समुदाय का वोट हासिल करना था.

चुनाव बाद सत्ता में आने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने भी हालांकि न्यायालय में पूर्ववर्ती सरकार के फैसले का समर्थन किया और कहा कि यह चुनावी फायदे की सोच से नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए किया गया था.


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