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अब और कुरबानी नहीं-अमर सिंह

अब और कुरबानी नहीं-अमर सिंह

नई दिल्ली. 11 अप्रैल 2010


अमर सिंह ने अब तय किया है कि वे किसी के लिये ‘कुरबानी’ नहीं देंगे. फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन से लेकर मुलायम सिंह यादव और सपा के दूसरे नेताओं पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष टिप्पणी करते हुए अमर सिंह ने पीड़ा जताई है कि उन्हें अपनों ने ही मदद नहीं की.

अपने ब्लॉग पर अमर सिंह ने कहा है कि मैं पहली बार मुंबई में बच्चन जी के घर नहीं रुका. अमूमन भीड़ के कारण होटल का कमरा तो कई बार लिया था लेकिन सोने अमित जी के घर ही जाता था. जया जी काफी बीमार है, कल उनका जन्मदिन भी था. घर जा कर उन्हें बधाई दी, बीमारी का हाल-चाल पूछा और चल दिया. कुछ भी अजीब नहीं लगा.

अमर सिंह ने लिखा है कि समाजवादी पार्टी से निष्कासन मेरे जीवन की सबसे बड़ी मुक्ति और मोह से निर्वाण है. दुःख है तो इस बात का कि अपनी पत्नी, परिवार और बच्चो से ज्यादा जिसको मान दिया, वह सब कही न कही मेरी मेहनत और प्रतिबद्धता से प्राप्त भौतिक उपलब्धियों के स्थाईत्व की चिंता में रम गए. मेरे स्नेह, अनुराग और समर्पण की भावना से अधिक भौतिकता की प्रासंगिकता और जीवन में प्रारब्ध से प्राप्त भौतिक उपलब्धियां मेरे व्यक्तित्व से बड़ी हो गई और मै बौना हो गया. वो छोटे-छोटे कार्यकर्ता जिन्हें मुझसे कुछ भी नहीं मिला जो संतरी है, खड़े हो गए और जिन्हें मैने मंत्री पद से नवाजा, उन्होंने मुंह फेर लिया.

सपा के प्रवक्ता मोहन सिंह पर निशाना साधते हुए अमर सिंह ने कहा है कि जब मेरी मदद से दवा-दारू कराने वाले, मुझसे वित्तीय मदद ले कर चुनाव लड़ने वाले मोहन सिंह प्रवक्ता बनते ही पार्टी के “डान” के इशारे पर मुझे बेशर्म कहे, कूड़ा कहे, मेरे अपने परिवार के लोग मुझे अपमान सहकर कैरिअर बनाने की सलाह दे, आज भी मेरी मदद से प्राप्त मकान में मेरे प्रेम से रह रहे पार्टी अध्यक्ष राज्य सभा सचिवालय को लिखित पत्र मेरे विरुद्ध दे और जन्मदिन की मौखिक बधाई देते हुए पूछे जाने पर मुझे कहें कि आपने राज्यसभा या संसदीय समिति की अध्यक्षता क्यूँ छोड़ी. क्या कथनी और करनी में कोई भेद न रखने के लिए जाने जाने वाले यह वही मुलायम सिंह जी है या यह कोई और है?

ईश्वरचंद विद्यासागर समेत इंदिरा गांधी के संदर्भों का हवाला देते हुए अमर सिंह ने अफने जाने-पहचाने अंदाज में गोपालदास नीरज की कविता को याद किया है- “आदमी माल जिसका खाता है, प्यार जिससे पाता है उसके ही सीने में भोंकता कटार है”. अंत में अमर सिंह ने संकल्प भी किया है- “खुद अपनी निगरानी कर, मत साँसे बेमानी कर, खुदगर्जों के खातिर अब मत कोई कुर्बानी कर.”
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vaanya chhattisgarh

 
 अल्लाह को प्यारी है कुरबानी. अमर सिंह जी, अगर आप अपने को गंभीरता से ले रहे हैं, तब तो ठीक है, वरना अभी तक तो आपकी भूमिका विदूषकों वाली ही रही है. 
   
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