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अरुंधती के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई

अरुंधती के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई

रायपुर. 12 अप्रैल 2010


सुप्रसिद्ध लेखिका अरुंधती राय के खिलाफ छत्तीसगढ़ पुलिस कानूनी कार्रवाई कर सकती है. उनके खिलाफ अनलॉफुल ऐक्टिविटिज (प्रिवेंशन) ऐक्ट (यूएनपीए) के तहत कार्रवाई हो सकती है. यह भी संभव है कि उन्हें छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून का सामना करना पड़े.

पिछले दिनों अरुंधती राय ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के साथ मुलाकात और कुछ समय गुजारने के बाद अंग्रेजी-हिंदी की पत्रिका ‘आउटलुक’ में विस्तार से एक रिपोर्ट लिखी थी. इस रिपोर्ट की शिकायत रायपुर के एक नागरिक ने राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राज्य के पुलिस महानिदेशक को करने के साथ-साथ स्थानीय पुलिस थाने में भी दर्ज करायी थी. शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में कहा है कि छत्तीसगढ़ में जनसुरक्षा कानून 2005 लागू है, जिसके तहत भाकपा माओवादी जैसे प्रतिबंधित संगठनों से बातचीत, मेल मिलाप पर कार्रवाई का प्रावधान है.

शिकायतकर्ता ने जानना चाहा है कि बस्तर जाने के पहले अरुंधति राय ने क्या राज्य शासन से अनुमति ली थी, या वहां से लौटने के बाद उन्होंने कोई रिपोर्ट राज्य शासन को दी. अगर यह दौरा बिना अनुमति के था, तो इस पर कार्रवाई होनी चाहिए.

सूत्रों के अनुसार इस शिकायत के आलोक में पुलिस ने एसआईबी को मामला सौंपा है, जहां यह देखा जा रहा है कि क्या सुश्री राय ने नक्सलियों को अपनी रिपोर्ट में महिमामंडित करने का काम किया है ? क्या उनके द्वारा लिखी गयी रिपोर्ट राज्य और राष्ट्र के कानून का उल्लंघन है ?
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rachna_174@123india.com गाजियाबाद

 
 जी हीँ उसे आतंकवादियों का महिमामंडन ही कहा जायेगा शेखर जी। अरुन्धति राय जैसी लेखिकाओं का काम ही यही है कि वे इश्यु को सेंसिटाईज करें और अपना बाजार बनाये। यह इंटेलेक्चुअर पूंजीवाद है जो वामपंथ के नाम पर जारी है। दस कवितायें आतंकवाद के खिलाफ आप कहें तो हम भी उदाहरण में दे दें लेकिन उससे यह सच्चाई बदल तो नहीं जायेगी कि सामाजिक मुद्दे केवल आड हैं जिसमें नक्सलवादियों के अपराध जारी हैं। 
   
 

शेखर मल्लिक (shekharmallick@yahoo.com) घाटशिला (झारखण्ड)

 
 जब भी कोई अच्छा काम कर रहा होता है, उसे इस देश के कुछ लोग बड़ी फूहड़ता से अपमानित करने से बाज नहीं आते. आऊटलुक के लेख में सुश्री राय जी ने तथाकथित महिला नक्सलियों की जो सच्चाई और पृष्ठभूमि जाहिर की है, क्या हम उसे नक्सलियों को महिमामंडित करना कह सकते हैं?

ठीक है कि हिंसा किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं हो सकता. मगर इस लोकतान्त्रिक देश में हम इतने अंधें तो नहीं हो सकते कि इस सामाजिक समस्या की जड़ को देखकर भी अनदेखा करते रहें.

मेरे देशवासियों, पहले आप भूख, सामाजिक असुरक्षा और बेरोजगारी का हल निकालिए, फिर कोई बन्दूक नहीं उठाएगा. वरना, बकौल नागार्जुन "जली ठूंठ पर गई कोकिला कूक/ बाल भी बांका ना कर सकी शासन की बन्दूक!"
 
   
 

अनिरुद्ध (ashrivastava@gmail.com) जगदलपुर

 
 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ से उद्धरित यह आर्टिकल अरुन्धति राय के बस्तर दौरे की इमानदार जाँच रिपोर्ट है। हाईलाईट्स-

माओवादियों ने बहुतों को मारा, और उनसे भी ज्यादा को बरगलाया है। उनका ताज़ातरीन शिकार अरुंधति राय है जो अपनी साहित्यिक प्रतिभा का इस्तेमाल उनके घिसे-पिटे दावों को काव्यात्मक अलंकरण में लपेटकर पेश करने के लिए करती हैं। वह अपनी सत्ता की भूख की तुलना जंगल में रहने वाले लोगों की जायज मांगों, अधिकारों और चिंताओं से करती हैं। जार्ज बुश के 'हम और वह' कहने पर ऐतराज करने वाली वह खुद, अब यही भाषा बोल रही हैं।
**
वह जंगल में रहने वालों की दुश्वारियों के बारे में बातें करते हुए इस नतीजे पर पहुंच जाती है कि उनके पास हिंसक होने के अलावा कोई चारा नहीं , उनमें हथियारों के लिए एक घिनौना लगाव नजर आता है। अनिर्बान गुप्ता निगम ने राय को kafila,org वेबसाईट में दिए गए जोशीले जवाब में इसका ज़िक्र भी किया है। रॉय कामरेडों के बमों, मोर्टारों, एके-47 पर वारी जाती हैं, एक मुठभेड़ में तुरत-फुरत बनाए गए एक विस्फोटक से पुलिस जवानों की जीप उड़ाने के वीडियो से प्रभावित युवाओं की भावनाएं बखानते हुये तो उन्होंने हद पार कर दी है। बहुत से कामरेड बाल सिपाही जैसे हैं, लेकिन क्रांति में सब जायज है। वरिष्ठ कामरेड संघर्ष की कहानियां सुनाकर बच्चों को लगातार बरगलाते रहते हैं- सियरा लिओने में फोदे साखो का युनाईटेड फ्रंट उत्तरी युगान्डा में जोसेफ नोय लार्ड की प्रतिरोधी सेना, और तमिल ईलम में मुक्ति चीते। माओ के चीन में बच्चों ने अपने माता- पिता को छोड़ दिया। पोल पोट के कम्बोडिया में उन्होंने अपने बड़ों पर क्रूरता की, क्या रॉय यही सांस्कृतिक क्रांति चाहती हैं? क्या उन्होंने बच्चों को यह बताया कि भविष्य की तरफ लम्बी छलांग (माओ की आर्थिक क्रांति 'ग्रेट लीप फार्वर्ड') असल में क्या थी?
**
माओवाद के लिए मुग्धता नैतिक संवेदनशीलता से परे है। यह एक समानांतर दुनिया है जहां गांधी की तर्ज पर होती भूख हड़ताल पर लोग पेट पकड़कर हंसते हैं, जहां जंगल में औरतों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार की तुलना शहर की औरतों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार से की जाती है। यह नैतिक समानता के पतन की नई ऊंचाई है। यह अनैतिक विनाशवाद है यह राय का हनोइ जेन पल भी है(हनोई जेन: वार सेक्स एंड फेंटेसीज ऑफ बिट्रेयल, जेरी लेम्बेक का उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि विख्यात भिनेत्री जेन फोंडा पर वियतनाम युध्द के दौरान तरह अमरीकी सैनिकों का मनोबल बल तोड़ने का आरोप लगता रहा है) वह एक विद्वान है जिसके लिये आकाश चादर है, तारे जिसके मार्गदर्शक हैं, पक्षियों का संगीत जिसकी अलार्म घड़ी है। वह इन तारों को अनोखे आकार में जोड़ती है। इस दुनिया में बच्चे स्कूल नहीं जाते, वह मुठभेड़ के वीडियो देखकर मारना सीखते हैं यहां आदिवासी और विद्रोहियों में कोई फर्क नहीं। जहां हाथ के एक इशारे से किए गए इंसाफ को ही सही मान लिया जाता है, क्योंकि दूसरी सारी बातें बेमानी हो चुकी हैं। यह माओस्तान है जहां लोग शायद ना वी भाषा (फिल्म अवतार के ग्रह की भाषा) बोलते हैं और राय उनकी अवतार है।
 
   
 

om peakash shukla (ops309@gmail.com) lucknow

 
 रंजन जी, क्या आपने आउटलूक की रिपोर्ट पढ़ी है ? अगर आपके अंदर थोड़ी भी ईमानदारी है, तो जो कुछ अरुंधती ने लिखा है, उसकी जांच करायें तो अच्छा रहेगा. एक बार डाक्टर विनायक सेन के मामले में फटकार खाने के बाद लगता तो नहीं कि आपके अंदर इतनी हिम्मत होगी. ये भी सोच कर राय दंतेवाड़ा गई होंगी, जहां अपनी गलतियों को सुधार कर ही लड़ाई को जीता जा सकता है, न कि इसे पर्दा डाल कर. वही सब तो इस स्थिति की वजह है, जो आज ये दिन देखना पड़ रहा है. जो पत्रकार पाकिस्तान जा रहे हैं, उनके लिये तो सरकारी व्यवस्था हो रही है और जो अपने देश की वास्तविकता बता रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की बात हो रही है. इन सबके बीच तो यही कहना होगा कि नींदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय... नहीं मानेंगे तो सफल नहीं हो सकते. 
   
 

Murthy (mvslmurthy@shreya.com ) Mumbai

 
 I think mr ranjan is right. If any action shall be taken against Arundhati she will become hero and unnecessary the issue of fighting against naxal shall get diluted.  
   
 

Anamika Tandi , Dhamtari, Chhattisgarh

 
 राजीव रंजन जी, अपनी जुबान ठीक रखते तो थोड़ी सभ्यता नजर आती. अरुंधती राय को दुनिया जानती है. उन्हें किसी सस्ती या महंगी लोकप्रियता की जरुरत नहीं है. अरुंधती राय को दुनिया उनकी लिखी हुई किताब के कारण जानती है ? और आपको ? आपको कोई नहीं जानता, इसलिये आप जैसे कुंठित लोग अऱुंधती को लेकर कुछ भी लिख कर सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं.  
   
 

गिरिजेश्वर झारखंड

 
 गोरख पाण्डेय की दो कविताएँ प्रस्तुत है, जरा गौर करें-
खबरदार
खबरदार,खतरा है,
यहाँ उसे वही कहना जो वह है।
......
जाहिर है कि यह बाजार है
योजनावद्ध बसा हुआ कालाबाजार
यहाँ नमक से लेकर आदमकद आदमी तक बिकाऊ है
कहें इसे लोकतंत्र जोर देकर
महात्मा के बंदरों ने सिखाया है –
बंद रखें आंखें
उंगलियां डाल लें कानों में
होंठ सी लें
.......
उसको फांसी दे दो

वह कहता है उसको रोटी कपड़ा चाहिए
बस इतना ही नहीं,उसे न्याय भी चाहिए
इस पर से उसको सचमुच आजादी चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है उसे हमेशा काम चाहिए
सिर्फ काम ही नहीं,काम का फल भी चाहिए
काम और फल पर बेरोक दखल भी चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है कोरा भाषण नहीं चाहिए
झूठे वादे हिंसक शासन नहीं चाहिए
भूखे नंगे लोगों की जलती छाती पर
नकली जनतंत्री सिंहासन नहीं चाहिए
उसको फांसी दे दो।

वह कहता है अब वह सबके साथ चलेगा
वह शोषण पर टिकी व्यवस्था को बदलेगा
किसी विदेशी ताकत से वह मिला हुआ है
उसको इस गद्दारी का फल तुरन्त मिलेगा
आओ देश भक्त जल्लादों !
पूँजी के विश्वस्त पियादों !
उसको फांसी दे दो।
 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 अवश्य कार्यवाई होनी चाहिये लेकिन ऐसा कर के अरुन्धती को "महान" बनाने का अभियान चल पडेगा। देशी और विदेशी "नक्सलियों की बी-टीम" के सदस्य लामबंद हो जायेंगे और खा-मखा इस महिला को "सस्ती" पब्लिसिटी मिल जायेगी जिसकी इसे चाहत भी है।

मेरी शिकायत कर्ता से विनम्र प्रार्थना है कि ऐसी महानता इन्हे न बख्शें। इनका सच सामने आ चुका है, समय इनके खिलाफ स्वयं कार्यवाई कर लेगा।
 
   
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