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आरबीआई ने ब्याज दरों में कटौती की

आरबीआई ने ब्याज दरों में कटौती की

नई दिल्ली. 2 जून 2015
 

आरबीआई

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के दौरान ब्याज दरों में 25 आधार अंकों की कटौती की है. ब्याज दरों में इस कटौती के साथ ही ईएमआई दरें घट सकती हैं.  इसके साथ ही नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को भी बिना बदलाव के चार प्रतिशत पर स्थिर रखा गया है.

मौजूदा वित्त वर्ष की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने वर्तमान और उभरती व्यापक आर्थिक परिस्थिति के आकलन के आधार पर रेपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती कर इसे 7.25 प्रतिशत कर दिया है.

रेपो दर वह दर होती है, जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को छोटी अवधि के लिए ऋण देता है.

गवर्नर राजन ने एक बयान में कहा, "रिवर्स रेपो दर भी 25 आधार अंक घटकर 6.25 प्रतिशत हो गई है, जबकि एमएसएफ दर एवं बैंक दर में कोई कटौती नहीं की गई है और यह 8.25 प्रतिशत पर बरकरार है."

राजन ने बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हमारी नीति न तो अधिक रूढ़िवादी है और न ही अधिक आक्रामक है, बल्कि यह बिल्कुल सटीक है."

आरबीआई की यह घोषणा पूर्वाह्न 11 बजे आई, जिसके बाद बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के संवेदी सूचकांक सेंसेक्स में 200 से अधिक अंकों की गिरावट दर्ज हुई. उस समय, एकदिनी कारोबार में 450 अंकों की गिरावट दर्ज हुई.

इस फैसले के पीछे के कारण गिनाते हुए राजन ने कहा कि वैश्विक वित्त बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है, औद्योगिक उत्पादन में सुधार हो रहा है, सेवा क्षेत्र से मिले-जुले संकेत मिल रहे हैं. ईंधन महंगाई दर उच्च बनी हुई है, निर्यात घट गया है और नकदी में सुधार हुआ है. इस वर्ष में आरबीआई ने अब तक रेपो दर में तीन बार कटौती की है.

राजन ने कहा कि आरबीआई मानसून की प्रगति पर नजर बनाए रखेगा और इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए सरकार द्वारा कदम उठाए जाएंगे. उन्होंने कहा, "पूर्व में भी अल नीनो की वजह से 2002-2003 में बारिश में कमी दर्ज हुई थी, लेकिन सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की वजह से कीमतें स्थिर रही थीं."

जनवरी 2016 के लिए महंगाई का स्तर भी बढ़ाकर छह प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि पहले 5.8 प्रतिशत का अनुमान रखा गया था.

राजन ने कहा, "औद्योगिक उत्पादन में सुधार हो रहा है. खपत खर्च में कमी आई है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में. उन्होंने कहा कि यदि लागत में कमी नहीं होती तो कंपनियों के निराशाजनक तिमाही नतीजे अधिक बुरे हो सकते थे."
 


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