पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > राष्ट्र > न्यायपालिका Print | Send to Friend | Share This 

पब्लिक-प्राइवेट सेक्टर भी आरटीआई के दायरे में

पब्लिक-प्राइवेट सेक्टर भी आरटीआई के दायरे में

चेन्नई. 19 अप्रैल 2010

हाल ही में पब्लिक प्रायवेट पार्टनरिशप परियोजना से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसले में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा न्यु तिरुपुर एरिया डेवेलपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड, एनटीएडीसीएल (जिसे आगे से हम कंपनी कहेंगे) की याचिका खारिज कर दी गई है. कंपनी ने यह याचिका तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के उस आदेश के खिलाफ दायर की थी जिसमें आयोग ने कंपनी को मंथन अध्ययन के द्वारा मांगी गई जानकारी उपलब्ध करवाने का आदेश दिया था.

एनटीएडीसीएल
एक हजार करोड़ की लागत वाली एनटीएडीसीएल देश की पहली जल प्रदाय परियोजना थी जिसे पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप के तहत माच 2004 में आरंभ किया गया था. परियोजना में काफी सारे सार्वजनिक संसाधन लगे हैं जिनमें 50 करोड़ अंशपूजी, 25 करोड़ कर्ज, 50 करोड़ कर्ज भुगतान की गारंटी, 71 करोड़ वाटर शार्टज फंड शामिल हैं. परियोजना को वित्तीय दृष्टि से सक्षम बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने ज्यादातर जोखिम जैसे नदी में पानी की कमी अथवा बिजली आपूर्ति बाधित होने की दशा में भुगतान की गारंटी, भू-अर्जन/ पुर्नवास की जिम्मेदारी, परियोजना की व्यवहार्यता हेतु न्यूनतम वित्तीय सहायता, नीतिगत और वैधानिक सहायता स्वयं अपने सिर ले ली है. सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकारियों को कंपनी में प्रतिनियुक्ति पर भी भेजा. सार्वजनिक क्षेत्र से इतने संसाधन प्राप्त करने के बावजूद भी कंपनी खुद को देश के कानून से परे मानती है.

पृष्ठभूमि
वर्ष 2007 में मंथन अध्ययन केंद्र ने सूचना का अधिकार अधिनयम 2005 के तहत आवेदन-पत्र भेजकर कर कंपनी द्वारा तिरुपुर में संचालित जल प्रदाय एवं मल निकास परियोजना के बारे में कुछ जानकारी मांगी थी. तमिलनाडु सरकार और तिरुपुर नगर निगम के साथ बीओओटी अनुबंध के तहत का काम कर रही कंपनी ने मंथन द्वारा वांछित सामान्य जानकारी देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि सूचना का अधिकार कानून के तहत वह ‘लोक प्राधिकारी’ नहीं है.

कंपनी के इस निर्णय के खिलाफ मंथन ने तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग में अपील की थी. आयोग ने अपने 24 मार्च 2008 के आदेश में कंपनी को लोक प्राधिकारी मानते हुए उसे मंथन अध्ययन केन्द्र द्वारा वांछित सूचना उपलब्ध करवाने का आदेश दिया था. लेकिन कंपनी ने मद्रास उच्च न्यायालय में तुरंत याचिका दायर कर तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के आदेश को रद्द करने की अपील कर दी. उच्च न्यायालय ने कंपनी, राज्य सरकार, राज्य सूचना आयोग और मंथन अध्ययन की दलीलें सुनने के बाद 6 अप्रैल 2010 को अपने विस्तृत आदेश में पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप से संबंधित संवैधानिक, वित्तीय, संचालन, सार्वजनिक सेवा आदि पर प्रकाश डालते हुए सिद्ध किया कि कंपनी द्वारा समाज को दी जाने वाली सेवा सार्वजनिक निगरानी में होनी चाहिए. जस्टिस के. चन्दू एकल पीठ ने कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि राज्य सूचना आयोग के फैसले में कोई असंवैधानिकता या कमी नहीं है.

प्रकरण से संबंधित तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय के फैसले में कहा गया है कि अपीर्लाथ (कंपनी) सूचना का अधिकार कानून की धारा 2 (एच) (डी) (1) के तहत लोक अधिकारी है. इसलिए राज्यॉ सूचना आयोग का आदेश एकदम सही है. उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार जब सरकार नगर निकाय की तरह आवश्यक सेवा कार्य खुद करने के बजाय याची कंपनी जैसी किसी कंपनी को पर्याप्त वित्त पोषण (Substantially financed) देकर उसे काम करने की मंजूरी देती है तो कोई भी इसे निजी गितिविधि नहीं मान सकता है. बि क ये पूरी तरीके से सार्वजनिक गितिविधि है और इसमें किसी की भी रुचि हो सकती है.

फैसले में उल्लेख है कि कंपनी की आवश्यक गितिविधि जल प्रदाय और मल निकास है जो नगर निकाय के समान है. ऐसे में कंपनी यह दावा कैसे कर सकती है कि वह समुचित सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं है. पर्याप्त वित्त के बारे में तो कंपनी ने स्वीकार किया है की कंपनी के कुल पूँजी निवेश में सरकार का हिस्सा 17.04% है. ऐसे मेंयह स्पष्ट नहीं है कि कंपनी कैसे तर्क करती है कि वह राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं है. केवल अंशधारक का Articles of Association दिखाने और यह कहने मात्र से कि वह न तो सरकार द्वारा नियंत्रित है और न ही पर्याप्त वित्तपोषित है, कंपनी सूचना का अधिकार कानून के दायरे से बाहर नहीं हो सकती है.

फैसले में रेखांकित किया गया है कि पूर्व स्वीकृति के बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) भी कंपनी के हिसाब-किताब का लेखा परीक्षण कर सकता है. ऊपरोक्त के प्रकाश में कंपनी यह तर्क नहीं दे सकती कि वह सूचना का अधिकार कानून के तहत “लोक प्राधिकारी” नहीं है. इसके विपरीत कंपनी राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित एवं पर्याप्त वित्तपोषित है .

फैसले में कहा गया है कि जब संविधान ने ऐसी गितिविधयों के लिए स्थानीय निकाय के बारे में आदेश दिया है तथा राज्य सरकार ने जल प्रदाय और मल निकास जैसे आवश्यक कार्य के लिए नगर निकाय बनाए हैं और जब ये कार्य अन्य व्यावसायिक समूहों को सौंपे जाते हैं, ऐसे में यह निश्चित है कि वे व्यावसायिक समूह नगर निकाय की तरह ही है. इसलिए हर नागरिक ऐसे समूह की कार्यप्रणाली के बारे में जानने का अधिकार रखता है. कहीं ऐसा न हो कि बीओटी काल में ये कंपनियां लोगों का शोषण करती रहे इसलिए इन्हें अपनी गितिविधियों की जानकारी देते रहना चाहिए. उनक गितिविधियों में पारदर्शिता और लोगों के जानने के अधिकार को सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता कि कंपनी ने राज्य सूचना आयोग से ऐसा आग्रह किया है.

यह स्पष्ट है कि राज्य के अतिरिक्त भी जब कोई निजी कंपनी सार्वजनिक गितिविधि संचालित करती है तो पीड़ित व्यक्ति के लिए न सिर्फ सामान्य कानून में बल्कि संविधान की धारा 226 के तहत याचिका के माध्यम से भी इसके समाधान का प्रावधान है. लोक प्राधिकारी होना इस बात पर निर्भर करेगा कि उसके द्वारा किया जाने वाला काम लोक सेवा है अथवा नहीं.

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

राजेश अग्रवाल (agrrajesh@gmail.com) बिलासपुर

 
 सूचना के अधिकार के लिए लड़ने वालों को एक और कामयाबी मिली. हालांकि नौकरशाही के चलते अभी भी बाधाएं कम नहीं हैं.  
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in