पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

मधुमेह की महामारी कीटनाशक के कारण?

सूचकांक से कहीं ज्यादा बड़ी है भुखमरी

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

मधुमेह की महामारी कीटनाशक के कारण?

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >राष्ट्र > Print | Share This  

डिजिटल दुनिया में हिंदी का उपयोग बढ़े : मोदी

डिजिटल दुनिया में हिंदी का उपयोग बढ़े : मोदी

भोपाल. 10 सितंबर 2015
 

मोदी

भोपाल में गुरुवार को तीन दिवसीय 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ रहा है, इसलिए जरूरी है कि हिंदी को और समृद्ध व सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास किए जाएं. इसके साथ हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ते हुए उसका डिजिटल दुनिया में उपयोग बढ़ाना होगा.

विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन स्थल लाल परेड मैदान में बसे माखनलाल चतुर्वेदी नगर में रामधारी सिंह दिनकर सभागार में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विदेशी प्रवासों का जिक्र करते हुए कहा कि इन प्रवासों के दौरान उन्हें पता चला है कि दुनिया के अन्य देशों में हिंदी के क्षेत्र में कितना काम हो रहा है और वे हिंदी को कितना पसंद करते हैं.

प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले दिनों में हिंदी का महत्व और बढ़ने वाला है, क्योंकि भाषा शास्त्रियों का मत है कि जिस तरह से दुनिया बदल रही है उसके चलते 21वीं शताब्दी के खत्म होने तक छह हजार भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाएं विलुप्त हो जाने की संभावना दिखाई दे रही है. इस चेतावनी को अगर हम न समझे और हमने अपनी भाषा का संरक्षण नहीं किया तो वह आर्कलॉजी का विषय बन जाएगा, हमारा दायित्व बनता है कि भाषा को समृद्घ कैसे बनाएं, और चीजों को जोड़ें. जब भाषा के दरवाजे बंद किए गए तब भाषा का नुकसान हुआ है.

उन्होंने कहा कि अगर हम हिंदी और रामचरित मानस को भूल जाते हैं तो हमारी स्थिति ठीक वैसी ही होगी, जैसे बगैर पैर के खड़े हैं. फणीश्वरनाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद जो हमें दे गए हैं, उसे नहीं पढ़ा तो हम बिहार की गरीबी और ग्रामीण जीवन को नहीं जान पाएंगे. इसलिए भाषा को समृद्घ बनाना होगा. अगर भाषा ही नहीं बची तो इतना बड़ा साहित्य का भंडार और अनुभव कहां बचेगा.
 


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in