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सर्जिकल स्ट्राइक पर आमने-सामने पार्टियां

सर्जिकल स्ट्राइक पर आमने-सामने पार्टियां

नई दिल्ली. 7 अगस्त 2016. बीबीसी
 

भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल स्ट्राइक के दावों पर शुरूआती ख़ामोशी के बाद अब भारत के राजनीतिक दल एक दूसरे को ही निशाने पर ले रहे हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले इन दावों पर चुप्पी साधे रखी.

फिर एक-एक कर राजनीतिक दल सर्जिकल स्ट्राइक के दावों का समर्थन करने लगे.

इस बीच भारत में टीवी चैनलों, सोशल मीडिया, ड्राइंग रूमों, सब्ज़ी और चाय की दुकानों पर ये मसला चर्चा-ए-आम हो गया है.

सोनिया-राहुल से लेकर नीतीश तक ने उड़ी हमलों के 'जवाब' में मोदी सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक के दावों पर सहमति जताई.

लेकिन 'बिल्ली के गले में घंटी' बाँधने का काम किया दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने.

केंद्र सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक के दावों को पूरा समर्थन देते हुए केजरीवाल ने शायद पहली बार खुल कर नरेंद्र मोदी की तारीफ़ भी की.  लेकिन अपने उस वीडियो संदेश में केजरीवाल एक 'सुर्री' छोड़ गए.

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया से कह रहा है कि सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई. ये गलत है और मोदी जी को पाकिस्तान के इस झूठ को उजागर करना चाहिए"

'घुमावदार' तरीक़े से केजरीवाल वो कह कर निकल गए जो भाजपा के राजनीतिक प्रतिद्वंदी शायद पब्लिक ओपिनियन को देखते हुए खुल कर नहीं कह पा रहे थे.

यहीं से शुरू होती है 'एक-दूसरे पर सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे पर स्ट्राइक'. केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने केजरीवाल की 'घुमावदार' मांग पर उनसे पूछ डाला 'आप पाकिस्तान के झूठ से प्रभावित क्यों हो रहे हैं".

एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा और आख़िरकार गुरुवार शाम राहुल गाँधी मोदी पर बोल बैठे. उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा, "वो जवानों के खून के पीछे छिपे हैं और उनकी दलाली कर रहे हैं".
अब आलम यह है कि कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि भाजपा ने चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को जन्म दिया है. दूसरी ओर, अमित शाह से राहुल गाँधी को सर्जिकल स्ट्राइक के बदले आलू की फ़ैक्ट्री पर बयान देने की नसीहत मिल रही है.

मायावती मुद्दे को सेना तक सीमित रखना चाह रही हैं, जिससे शायद 'दूसरे' वाहवाही न बटोर ले जाएं.

लेकिन कुछ मंझे हुए राजनीतिक समीक्षक राहुल के इस बयान की 'अहमियत' या 'नुकसान' को दूसरे उदाहरणों से तुलना कर बता रहे हैं.

पत्रकार अंबिकानंद सहाय ने बीबीसी से कहा, "मैं यह नहीं कह रहा कि राहुल का 'दलाली' वाला बयान ग़लत है या सही. लेकिन मौका बहुत ग़लत है. वर्षों पहले गुजरात में मौत के सौदागर' का जुमला बहुत चला और कांग्रेस को उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा. इसके बाद 'ख़ूनी पंजे' का दौर आया. इन दोनों मामलों में नुकसान कांग्रेस को, फ़ायदा मोदी को हुआ".

सर्जिकल स्ट्राइक की राजनीतिक रस्साकशी को जानकार अब राजनीतिक नफ़ा-नुकसान के तराजू के पलड़ों-सा बता रहे हैं.

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव अगला सबसे बड़ा 'दंगल' है और 'वॉर हिस्टीरिया' के साए में हुए चुनाव मूल मुद्दों से थोड़ा भटक भी सकते हैं. किसी के लिए फ़ायदा और किसी को नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह को लगता है, "सर्जिकल स्ट्राइक पर जो भी बयानबाज़ी हो रही है, वह राजनीतिक नासमझी लगती है. एक ऐसी अजीब सी स्थिति है जब आप अपने प्रतिद्वंदी और उसकी फ़ैसलों या कदम को समझ नहीं पा रहे हैं".
 


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