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भोपाल गैस कांड में 8 को सज़ा

भोपाल गैस कांड में 8 को सज़ा

भोपाल. 7 जून 2010

भोपाल गैस कांड मामले में 23 साल बाद सोमवार को भोपाल के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मोहन पी तिवारी ने 8 आरोपियों को दोषी करार दिया है. कोर्ट ने इन आरोपियों को धारा 304-ए के तहत लापरवाही का दोषी पाया और इन सभी को दो-दो साल की सज़ा सुनाई है.

ज्ञात रहे कि 2-3 दिसंबर 1984 की रात भोपाल की यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की फैक्टरी से मिक नामक गैस के रिसाव ने भोपाल में मौत का तांडव मचा दिया था. इस हादसे में 15 हजार लोगों की मौत हुई थी और हजारों लोग हमेशा के लिये विकलांग हो गये थे.

आज अदालत ने जिन लोगों को दोषी ठहराया है, उनमें केशव महेंद्रा, तत्कालीन अध्यक्ष यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल), विजय गोखले, तत्कालीन एमडी यूसीआईएल, किशोर कामदार, तत्कालीन वाइस प्रेसीडेंट, इंचार्ज, एपी डिवीजन यूसीआईएल, जे मुकुंद, तत्कालीन वर्क्‍स मैनेजर, एपी डिवीजन यूसीआईएल भोपाल, एसपी चौधरी, तत्कालीन प्रोडक्शन मैनेजर, एपी डिवीजन यूसीआईएल भोपाल, केवी शेट्टी, तत्कालीन प्लांट सुप्रिटेंडेंट, एसआई कुरैशी, तत्कालीन प्रोडक्शन असिस्टेंट शामिल हैं. इस मामले में सीबीआई ने गैस कांड मामले में यूनियन कार्बाइड कॉपरेरेशन के तत्कालीन चेयरमैन वारेन एंडरसन समेत 12 को आरोपी बनाया था.

ज्ञात रहे कि भारतीय इतिहास के इस भयानक लापरवाही के कारण हुई दुर्घटना में भोपाल में मामला दर्ज होने के बाद के 3 सालों तक मामला स्थानीय अदालत में पड़ा रहा. बाद में इस मामले को सीबीआई को सौंपा गया.

अदालत दर अदालत
सीबीआई ने 30 नवंबर 1987 को वारेन एंडरसन सहित 12 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया. 1989 में पीड़ितों ने मुआवजे के लिए मामले अदालत में लगाए. बाद में इनकी ओर से केंद्र सरकार ने मुआवजे के लिए मुकदमा अमरीका की कोर्ट में लगाया लेकिन वहां मामला सुनवाई योग्य नहीं पाये जाने के बाद इसे भोपाल में लगाया गया.

भोपाल के जिला न्यायाधीश एम डब्ल्यू देव ने अंतरिम मुआवजे के तौर पर 710 करोड़ रुपए के भुगतान का आदेश दिया, जिसे यूनियन कार्बाइड कॉपरेरेशन ने चुनौती दी. बाद में मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा.

मुकदमा खत्म
उच्चतम न्यायालय में अंतरिम आदेश पर सुनवाई के दौरान 14 फरवरी 1989 को दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. समझौते में तय हुआ कि यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन अमरीका और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड समझौता राशि का भुगतान करेगी और इसके बाद गैस त्रासदी से जुड़े सभी सिविल और आपराधिक प्रकरण खत्म हो जाएंगे. यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन द्वारा समझौता राशि का भुगतान कर दिया गया और सभी मुकदमे खत्म हो गए.

इसके बाद कुछ संगठनों की ओर से उच्चतम न्यायालय में एक रिव्यू पिटीशन लगाकर मांग की गई कि आपराधिक प्रकरण खत्म नहीं किया जा सकता. उच्चतम न्यायालय ने 3 अक्टूबर 1991 को आपराधिक प्रकरण चलाने का आदेश दिया, जिसके बाद अदालती कार्रवाई के दौरान मामला फिर से उच्चतम न्यायालय पहुंचा. जहां, 1996 में उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि आरोपियों के खिलाफ 304 ए में मामला चलाया जाए.


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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Alok Khare Faridabad

 
 अरे वाह. इस सीरियल ने तो भारतीय टेलीविज़न के सारे रिकार्ड तोड़ दिए. जहां तक मुझे ज्ञात है सजा 2 साल की ज़रूर हुई लेकिन छूटने में बमुश्किल 2 घंटे लगे. अरे भाई सरकारी काम काज ऐसा ही है भारत का, कागज वगैरह तैयार करने में थोड़ा ज्यादा वक्त लग गया.

हे मेरे मजबूर पीडित/ त्रस्त भोपाल गैस कांड के दुखियारों, मेरी आप सभी के साथ सहानुभूति है, इससे ज्यादा आपको कुछ नहीं मिलने वाला था, न मिलेगा...... मज़बूर को संतुष्ट होना ही पड़ता है.
 
   
 

bhahat singh raipur

 
 बेहद शर्मनाक, 25 साल बाद 15000 मौतों के लिए जिम्मेदार में केवल 8 लोगों को 2 साल की सज़ा, एक लाख का जुर्माना और आधा घंटे बाद 25 हजार की जमानत पर रिहा, एंडरसन अभी तक फरार है, ये क्या मज़ाक है. ऐसे न्यायाधीशों के लिए ही पिछले दिनों वीरप्पा मोइली (कानून मंत्री) ने कहा था कि समय पर और सही निर्णय ना होने के कारण नक्सलवाद बढ़ा. इस निर्णय की जितनी निंदा की जाए वो कम है. 
   
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