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अरुंधति के व्याख्यान की झूठी रिपोर्ट का आरोप

अरुंधति के व्याख्यान की झूठी रिपोर्ट का आरोप

मुंबई. 7 जून 2010


मुंबई में कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अरुंधति राय द्वारा दिये गये व्याख्यान की मनमानी खबरों पर आयोजकों ने चिंता व्यक्त की है. आयोजकों ने संवाद एजेंसी पीटीआई को पत्र लिख कर अरुंधति के कहे के ठीक उलट खबर जारी करने का आरोप लगाया है.

पीटीआई के क्षेत्रीय प्रबंधक को लिखे पत्र में कहा गया है कि मुंबई में आयोजित बैठक में अरुंधति द्वारा किए गए भाषण के बारे में दी गई पीटीआई की रिपोर्ट कई मायनों में गलत थी.

पत्र में कहा गया है कि इस रिपोर्ट में उनकी प्रस्तुति से वाक्यों और वाक्यांशों को लिया गया है और उन्हें पूरी तरह से पुनः व्यवस्थित कर के इस तरह से लिखा गया है, जिससे उनके द्वारा कहा गया पूरी तरह से गलत ढंग से पेश हो. इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे वक्तव्य भी उनके बताए गए हैं जो कि गलत हैं, जो कहे ही नहीं गये हैं.

आयोजकों ने पत्र में कहा है कि उपरोक्त आयोजन में अरुंधति राय ने कहा है कि वे निर्दोषों की हत्या की विरोधी हैं और इसे टाईम्स ऑफ इंडिया, मुंबई ने 3 जून 2010 के अंक में “वे यहां पर किसी भी पक्ष द्वारा की गई हत्याओं का बचाव करने के लिए नहीं थी”, कहकर सही तरीके से रिपोर्ट किया. उन्होंने कहा कि माओवादी उन सभी प्रतिरोध आंदोलनों का जो कि व्यवसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा जमीन हथियाने के विरोध में हैं, का आतंकी हिस्सा हैं. उन्होंने ये भी कहा कि सरकार उन सभी से शत्रुता और दमनकारी तरीके से निपटती है.

आयोजकों ने तथ्यों के साथ बात करते हुए कहा है कि पीटीआई की रिपोर्ट के ठीक उल्टा उन्होंने यह नहीं कहा कि “वे माओवादियों के सशस्त्र संघर्ष का साथ देती रहेंगी भले ही उन्हें सलखों के पीछे डाल दिया जाए.”

पत्र में आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि अरुंधति राय ने सरकार से माओवादियों का समर्थन करने के लिए उन्हें जेल में डाले जाने का आह्वान नहीं किया है, न ही माओवादियों को कोई समर्थन प्रदान किया है. वास्तव में, नवभारत टाइम्स, मुंबई संस्करण, जून 3, 2010, ने रिपोर्ट किया है कि उन्होंने कहा है कि "माओवादी के पास सिर्फ क्रांतिकारी तरीके हैं बल्कि कोई क्रांतिकारी दृष्टिकोण नहीं" और “उनकी खनन नीति भी राज्य के बहुत से अलग नहीं है. वे भी बॉक्साईट को पहाड़ों पर रहने देने के बजाय खनन कर लेंगे, जो कि उन लोगों की चाहत है जिनके लिए वो लड़ाई लड़ रहे हैं”.

टाइम्स ने आगे भी उन्हें सही ढंग से पेश किया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि “हमें पूंजीवाद और साम्यवाद से बाहर का एक दृष्टिकोण चाहिए”. इस प्रकार अरुंधति राय ने वास्तव में माओवादियों के समक्ष कई गंभीर सवाल रखे. रॉय ने कहा कि मध्य भारत में आदिवासी क्षेत्रों के बीच में बड़े खनन ठेके न केवल आदिवासियों के लिए, लेकिन संपूर्ण मानवता के लिए खतरा हैं, अगर उनका पर्यावरण पर हो रहे प्रभाव का आकलन किया जाए. यह सब जो कि उनकी बात का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा और उसका असली सार है, उसे बहुत प्रसन्नतापूर्वक आपके स्टाफ रिपोर्टर द्वारा नज़रअंदाज किया गया है.

आयोजकों ने पत्र में कहा है कि अरुंधति राय ने लोगों को हथियार उठाने के पीछे के कारण के विश्लेषण की कोशिश की थी, कि क्यों आदिवासी लोगों को बंदूकें उठाने के लिए मज़दूर होना पड़ा. उन्होंने गृह मंत्रालय के सैन्य समाधान का समर्थन करने से इंकार कर दिया. जैसा कि पीटीआई की रिपोर्ट में बताया गया है, राय ने नहीं कहा कि “यह एक सशस्त्र (जोर देकर) आंदोलन होने वाला था.”

आयोजकों ने कहा कि हमें अरुंधति राय द्वारा “दंतेवाड़ा के लोगों को माओवादियों द्वारा 76 सीआरपीएफ जवानों और पुलिस की सुरक्षा बलों पर हुए सबसे जघन्य हमले में हत्या करने के बाद सलामी देने” के बारे में भी कोई जानकारी नहीं हैं. उन्होंने मीटिंग में तो ऐसा कुछ भी नहीं किया था.
आयोजकों के अनुसार यह उल्लेखनीय है कि द हिंदू ने 3 जून में इस पर एक बहुत ही सही स्टोरी की है और अगले ही दजिन पीटीआई उसका एक झूठा और मनगढ़ंत रूप लेकर हाज़िर हो गया, जिसे बाद में इंडियन एक्सप्रेस द्वारा लिया गया. टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली, एनडीटीवी, आइबीएन लाइव, इकानमिक टाइम्स और कई हिंदी और अन्य भाषाओं के अखबारों ने 4 जून में इसे प्रकाशित किया, जबकि कईयों के रिपोर्टर इस आयोजन में मौजूद थे.

आयोजकों ने इस खबर को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा है कि पीटीआई नैतिक रिपोर्टिंग के नियमों को ताक पर रखकर इस स्तर तक गिर गया है.


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